रक्षाबंधन उत्सव

भारत माता की जय

Wednesday, 13 June 2018

जय जय श्री राम

।। श्री गणेशाय नमः।।

रामदास रामायण लिखते जाते और शिष्यों को सुनाते जाते थे। हनुमान भी उसे गुप्त रुप से सुनने के लिए आकर बैठते थे। समर्थरामदास ने लिखा, "हनुमान अशोक वन में गये, वहाँ उन्होंने सफेद फूल देखे।"

यह सुनते ही हनुमान झट से प्रकट हो गये और बोले, "मैंने सफेद फूल नहीं देखे थे। तुमने गलत लिखा है, उसे सुधार दो।"

समर्थ ने कहा, मैंने ठीक ही लिखा है। तुमने सफेद फूल ही देखे थे।"

हनुमान ने कहा, "कैसी बात करते हो! मैं स्वयं वहां गया और मैं ही झूठा!"

अंत में झगड़ा रामचंद्रजी के पास पहुंचा। उन्होंने कहा, "फूल तो सफेद ही थे, परंतु हनुमान की आंखें क्रोध से लाल हो रही थीं, इसलिए वे उन्हें लाल दिखाई दिये।"

इस मधुर कथा का आशय यही है कि संसार की ओर देखने की जैसी हमारी दृष्टि होगी, संसार हमें वैसा ही दिखाई देगा।

  जय जय श्री राम

Tuesday, 12 June 2018

श्री गणेशाय नमः

।। श्री गणेशाय नमः ।।
                  ।। मंगल सुप्रभातम् ।।
पुराने समय की बात है एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। शिक्षा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करने का समय आया, तब गुरु ने शिष्य को आशीर्वाद के रूप में एक ऐसा दर्पण दिया, जिसमें व्यक्ति के मन के छिपे हुए भाव दिखाई देते थे।शिष्य उस दर्पण को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ।

शिष्य ने परीक्षा लेने के लिए दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी की ओर ही कर दिया। शिष्य ने दर्पण में देखा कि उसके गुरुजी के मन में मोह, अहंकार, क्रोध आदि बुरी बातें हैं। यह देखकर शिष्य को दुख हुआ, क्योंकि वह अपने गुरुजी को सभी बुराइयों से रहित समझता था।शिष्य दर्पण लेकर गुरुकुल से रवाना हुआ। उसने अपने मित्रों और परिचितों के सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। शिष्य को सभी के मन में कोई न कोई बुराई दिखाई दी। उसने अपने माता-पिता की भी दर्पण से ली। माता-पिता के मन में भी उसे कुछ बुराइयां दिखाई दीं। यह देखकर शिष्य को बहुत दुख हुआ और इसके बाद वह एक बार फिर गुरुकुल पहुंचा।

गुरुकुल में शिष्य ने गुरुजी से कहा कि गुरुदेव मैंने इस दर्पण की मदद से देखा कि सभी के मन में कुछ न कुछ बुराई जरूर है। तब गुरुजी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया। शिष्य ने दर्पण में देखा कि उसके मन में भी अहंकार, क्रोध जैसी बुराइयां है।

गुरुजी ने शिष्य को समझाते हुए कहा कि यह दर्पण मैंने तुम्हें अपनी बुराइयां देखकर खुद में सुधार करने के लिए दिया था, दूसरों की बुराइयां देखने के लिए नहीं। जितना समय दूसरों की बुराइयों देखने में लगाया, उतना समय खुद को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता।हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि हम दूसरों की बुराइयां जानने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं। जबकि खुद को सुधारने के बारे में नहीं सोचते हैं। हमें दूसरों की बुराइयों को नहीं, बल्कि खुद की बुराइयों को खोजकर सुधारना चाहिए। तभी जीवन सुखी हो सकता है।

  जय श्रीमन्नारायण

Sunday, 10 June 2018

मदद लाल ढींगरा जी

मदनलाल धींगड़ा
अमृतसर, पंजाब, ब्रिटिश भारत

मृत्यु17 अगस्त 1909
पेंटविले जेल, लन्दन यू॰के

मदनलाल धींगड़ा का जन्म १८ सितम्बर सन् १८८३ को पंजाब प्रान्त सम्पन्न हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता दित्तामल जी सिविल सर्जन थे किन्तु माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं भारतीय संस्कारों से परिपूर्ण महिला थीं। उनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था और जब मदनलाल को भारतीय स्वतन्त्रता सम्बन्धी क्रान्ति के आरोप में लाहौर के एक कालेज से निकाल दिया गया तो परिवार ने मदनलाल से नाता तोड़ लिया।
मदनलाल को जीवन यापन के लिये पहले एक क्लर्क के रूप में, फिर एक तांगा-चालक के रूप में और अन्त में एक कारखाने में श्रमिक के रूप में काम करना पड़ा। कारखाने में श्रमिकों की दशा सुधारने हेतु उन्होने यूनियन (संघ) बनाने की कोशिश की किन्तु वहाँ से भी उन्हें निकाल दिया गया।
 कुछ दिन उन्होंने मुम्बई में काम किया फिर अपनी बड़े भाई की सलाह पर सन् १९०६ में उच्च शिक्षा प्राप्त करने इंग्लैण्ड चले गये जहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कालेज लन्दन में यांत्रिकी अभियांत्रिकी में प्रवेश ले लिया। विदेश में रहकर अध्ययन करने के लिये उन्हें उनके बड़े भाई ने तो सहायता दी ही, इंग्लैण्ड में रह रहे कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं से भी आर्थिक मदद मिली थी।
लन्दन में धींगड़ा भारत के प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के सम्पर्क में आये। वे लोग धींगड़ा की प्रचण्ड देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। ऐसा विश्वास किया जाता है कि सावरकर ने ही मदनलाल को अभिनव भारत नामक क्रान्तिकारी संस्था का सदस्य बनाया और हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। मदनलाल धींगड़ा इण्डिया हाउस में रहते थे जो उन दिनों भारतीय विद्यार्थियों के राजनैतिक क्रियाकलापों का केन्द्र हुआ करता था।
 ये लोग उस समय खुदीराम बोस, कन्हाई लाल दत्त, सतिन्दर पाल और काशी राम जैसे क्रान्तिकारियों को मृत्युदण्ड दिये जाने से बहुत क्रोधित थे। कई इतिहासकार मानते हैं कि इन्ही घटनाओं ने सावरकर और धींगड़ा को सीधे बदला लेने के लिये विवश किया।

कर्जन वायली का वध

१ जुलाई सन् १९०९ की शाम को इण्डियन नेशनल ऐसोसिएशन के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिये भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज इकठे हुए। जैसे ही भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ हाल में घुसे, ढींगरा ने उनके चेहरे पर पाँच गोलियाँ दागी; इसमें से चार सही निशाने पर लगीं। उसके बाद धींगड़ा ने अपने पिस्तौल से स्वयं को भी गोली मारनी चाही किन्तु उन्हें पकड़ लिया गया।

अभियोग

२३ जुलाई १९०९ को धींगड़ा मामले की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट में हुई। अदालत ने उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया और १७ अगस्त सन् १९०९ को लन्दन की पेंटविले जेल में फाँसीपर लटका कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी। मदनलाल मर कर भी अमर हो गये।

महान स्वतंत्रता सेनानी मदन लाल ढींगरा जी कोटि-कोटि नमन वंदन

Saturday, 9 June 2018

जय सूर्य देव

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।                                                                                                                 ।। जय श्री सूर्य नारायण ।।

नमस्सविते, सूर्याय, भास्कराय, विवस्वतै ।
आदित्यादिभूताय, देवांनीनाम नमस्तुते ।।

सूर्य देव को जल अर्पित करने का भी एक विधान है। यदि आप विधानपूर्वक उन्हें अर्घ्य नहीं देंगे तो सकारात्मक की बजाय नकारात्मक परिणाम मिलेंगे। अपकी जन्मकुंडली में सूर्य शुभ है तो समाज में मान-सम्मान के साथ-साथ उच्च पद की भी प्राप्ति होगी। हंसते-खेलते परिवार का साथ मिलेगा और रोगों से कोसों दूर रहेंगे। यदि सूर्य कमजोर है तो जीवन में बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

सूर्य देव को अर्घ्य देते वक्त रखें ध्यान

१.ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें। साफ और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
२.जब सूर्य लालिमा युक्त हो उस समय उनके दर्शन करके अर्घ्य देना शुभ होता है।
३.अर्घ्य देते समय हाथ सिर से ऊपर होने चाहिए। ऐसा करने से सूर्य की सातों किरणें  शरीर पर पड़ती हैं। सूर्य देव को जल अर्पित करने से नवग्रह की भी कृपा रहती है।
४.तीन परिक्रमा करें।
५ मनोवांछित फल पाने के लिए प्रतिदिन इस मंत्र का उच्चारण करें- ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।

              ।। जयतु सनातन धर्मः ।।
                 ।। जय सूर्य देव ।।

Friday, 8 June 2018

जय श्री राम जी

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।                                                                                                             
 ।। जय जय श्री राम ।।

श्रीगणपति श्रीगुरु नमो, नमो कवीश कपीस।
सब सन्तों के चरण में, नवा रहा हूँ शीश।।
उमा-शम्भु में जिस तरह हुआ रुचिर संवाद।
पहले उसी प्रसंग का, करना है अनुवाद।।
भारत में विख्यात है-सुन्दर गिरि कैलास।
गिरिजापति गिरिजा-सहित करते जहाँ निवास।।
उस तपोभूमि पर एक दिवस वट के नीचे बैठे हर थे।
सच्चिदानन्द के चिन्तन में एकाग्रचित भूतेश्वर थे।।

भगवान् त्रिलोचन के समीप भगवती उमा थी भ्राज रही।
मानों दाएँ हों परम पुरुष, बाएँ-दिशि प्रकृति विराज रही।।
खुली जभी योगेश की, वह समाधि अविराम।
मुख से निकला शब्द यह-‘जय मायापति राम’।।

राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥
शिवजी रामनाम का स्मरण करने लगे, तब सतीजी ने जाना कि अब जगत के स्वामी (शिवजी) जागे। उन्होंने जाकर शिवजी के चरणों में प्रणाम किया। शिवजी ने उनको बैठने के लिए सामने आसन दिया॥

गिरी गिरिसुता चरण में, तभी जोड़करहाथ।
पूर्व जन्म की यादकर, बोल उठीं-‘हे नाथ’।।
यह मायापति हैं राम कौन ? जिनकी इतनी धुन है मन में ?
क्या वही जानकी-जीवन हैं, जो व्याकुल बिचरे हैं वन में ?
            ।। जयतु सनातन धर्मः ।।
                  ।। जय श्री राम।।

Wednesday, 2 May 2018

जयतु सनातन धर्मः

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।                                                                                                                 ।। जयतु सनातन धर्मः ।।

यतो धर्म: ततो जय:
         अर्थात
जहाँ धर्म है वहाँ विजय है।

महाभारत मे अनेक स्थानों पर, यह बात कही गई है।इस पर विचार करने पर सर्वप्रथम धर्म का शाब्दिक अर्थ जानना पड़ेगा।”धृ” मे “मन्” प्रत्यय लगा कर धर्म शब्द बना है ,जिसमें “धृ”धातु का अर्थ धारण और पोषण करना है।
शाब्दिक दृष्टि से मतलब हुआ कि धर्म वह है, जो मनुष्य को मनुष्यता धारण कराए और आजीवन उस मनुष्यता को ही परिपुष्ट करे।इस प्रकार फलित हुआ कि, धर्म मानव जीवन का वह तत्व है, जिससे वह मनुष्य बनता है।
तब प्रश्न उठा कि वह क्या है जिससे मनुष्य की मनुष्यता सुरक्षित रहती है, तो उत्तर आया ,आचरण। (आचार:परमो धर्म: ) मनुष्य जीवन का आदर्श ही है मानवीय विचाराचार ।
गीतोक्त बात -स्वधर्मे निधनं
श्रेय: परधर्मो भयावह:” ने और भी स्पष्ट किया कि यदि हम मानवीय आचारादि त्याग कर अमानवीय व्यवहार ग्रहण करें तो हम राक्षस/पशु कहे जाने योग्य होंगे।इसीलिये अपने मानव जीवन मूल्यों-त्याग, करूणा, दया, क्षमा, धैर्य, सन्तोष आदि का पालन करते हुए उसके लिये मर मिटना, श्रेयस्कर है,नहीं तो संग्रह और असन्तोष आदि तो भयंकर दु:ख के ही कारण बनते हैं।
अतः सर्वस्व न्योछावर करके भी “धर्म”(मानवीय कर्तव्य कर्म पूर्वक सत्याचरण)मार्ग पर ही चलने मे विजय प्राप्ति सुनिश्चित है।और अन्तिम बात तो ये है कि धर्म न केवल इस जन्म मे वास्तविक विजयकारक है, अपितु अन्यजन्म मे मानव का एकमात्र साथी भी है-देहश्चितायां परलोक मार्गे धर्मानुगो गच्छति जीव एक:।

।।हरि शरणम्।।
     
     
                  ।। जय श्री राधे।।

Tuesday, 1 May 2018

जय श्री राधे श्याम

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।                                                                                                             ।। पोस्ट- ९८ ।। ।। जय श्री कृष्ण ।।
अजब हैरान हूं भगवन! तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं
कोई वस्तु नहीं ऐसी, जिसे सेवा में लाऊं मैं.
करें किस तौर आवाहन कि तुम मौजूद हो हर जां,
निरादर है बुलाने को, अगर घंटी बजाऊं मैं.
तुम्हीं हो मूर्ति में भी, तुम्हीं व्यापक हो फूलों में,
भला भगवान  पर भगवान को कैसे चढाऊं मैं.
लगाना भोग कुछ तुमको, यह एक अपमान करना है,
खिलाता है जो सब जग को, उसे कैसे खिलाऊं मैं.
तुम्हारी ज्योति से रोशन हैं, सूरज, चांद और तारे,
महा अन्धेर है कैसे तुम्हें दीपक दिखाऊं मैं.
भुजाएं हैं, न गर्दन है, न सीना है न पेशानी,
तुम हो निर्लेप नारायण, कहां चंदन लगाऊँ मैं.

बड़े नादान है वे जन जो गढ़ते आपकी मूरत
बनाता है जो सब जग को, उसे कैसे बनाऊँ मैं.    
अजब हैरान हूं भगवन! तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं
कोई वस्तु नहीं ऐसी, जिसे सेवा में लाऊं मैं.
  
            ।। जयतु सनातन धर्मः ।।
                  ।। जय श्री राधे।।

तुलसीदास

  “पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी धरयो शरीर||" तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा...