रक्षाबंधन उत्सव

भारत माता की जय

Friday, 2 August 2019

दशावतार

मत्स्य: कूर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामन: रामो रामश्च रामश्च कृष्ण: कल्कि च ते दश।

श्रीजयदेव गोस्वामी विरचित श्रीगीतगोविन्दम दशावतार खण्ड श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजजीके अनुगृहीत त्रिदण्डिस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा सम्पादित एवं डॉ विनय कुमार श्रीवास्तव द्वारा संकलित
12वीं शताब्दी के कवि जयदेव द्वारा रचित गीतगोविन्द 12अध्यायों वाला एक गीतिकाव्य है जिसे प्रबंध कहे जाने वाले चौबीस भागों में विभाजित किया गया है । प्रथम अध्याय में चार परिचयात्मक श्लोक हैं,जिनके बाद दशावतार वर्णन के रूप में ग्यारह अष्टपदी हैं जो भगवान विष्णु के दस अवतारों के उद्देश्यों का वर्णन करते हैं और अंत में रचना के निर्बाध समापन के लिए समर्पण किया गया है।
प्रलय पयोधि जले धृतवान् असि वेदम् |

विहित वहित्र चरित्रम् अखेदम् ||

केशव धृत मीन शरीर जय जगत् ईश हरे ||  १ ||
अनुवाद - हे जगदीश्वर! हे हरे! नौका (जलयान) जैसे बिना किसी खेदके सहर्ष सलिलस्थित किसी वस्तुका उद्धार करती है, वैसे ही आपने बिना किसी परिश्रमके निर्मल चरित्रके समान प्रलय जलधिमें मत्स्यरूपमें अवतीर्ण होकर वेदोंको धारणकर उनका उद्धार किया है। हे मत्स्यावतारधारी श्रीभगवान्! आपकी जय हो || १ ||
क्षितिः अति विपुल तरे तव तिष्ठति पृष्ठे |

        धरणि धरण किण चक्र गरिष्ठे  ||                  

केशव धृत कच्छप रूप जय जगदीश हरे || २ ||
अनुवाद - हे केशिनिसूदन! हे जगदीश! हे हरे! आपने कूर्मरूप अंगीकार कर अपने विशाल पृष्ठके एक प्रान्तमें पृथ्वीको धारण किया है, जिससे आपकी पीठ व्रणके चिन्होंसे गौरवान्वित हो रही है। आपकी जय हो || २ ||
वसति दशन शिखरे धरणी तव लग्ना |

शशिनि कलंक कल इव निमग्ना ||

केशव धृत सूकर रूप जय जगदीश हरे || ३ ||


अनुवाद - हे जगदीश! हे केशव! हे हरे! हे वराहरूपधारी ! जिस प्रकार चन्द्रमा अपने भीतर कलंकके सहित सम्मिलित रूपसे दिखाई देता है, उसी प्रकार आपके दाँतों के ऊपर पृथ्वी अवस्थित है || ३ ||
तव कर कमल वरे नखम् अद्भुत शृंगम् |

दलित हिरण्यकशिपु  तनु भृंगम् ||

केशव धृत नर हरि रूप जय जगदीश हरे || ४ ||
अनुवाद - हे जगदीश्वर! हे हरे ! हे केशव ! आपने नृसिंह रूप धारण किया है। आपके श्रेष्ठ करकमलमें नखरूपी अदभुत श्रृंग विद्यमान है, जिससे हिरण्यकशिपुके शरीरको आपने ऐसे विदीर्ण कर दिया जैसे भ्रमर पुष्पका विदारण कर देता है,आपकी जय हो || ४ ||
छलयसि विक्रमणे बलिम् अद्भुत वामन |

पद नख नीर जनित जन पावन ||

केशव धृत वामन रूप जय जगदीश हरे || ५ ||


अनुवाद - हे सम्पूर्ण जगतके स्वामिन् ! हे श्रीहरे ! हे केशव! आप वामन रूप धारणकर तीन पग धरतीकी याचनाकी क्रियासे बलि राजाकी वंचना कर रहे हैं। यह लोक समुदाय आपके पद-नख-स्थित सलिलसे पवित्र हुआ है। हे अदभुत वामन देव ! आपकी जय हो || ५ ||
क्षत्रिय रुधिरमये जगत् अपगत पापम् |

स्नपयसि पयसि शमित भव तापम् ||

केशव धृत भृघु पति रूप जय जगदीश हरे || ६ ||


अनुवाद - हे जगदीश! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने भृगु (परशुराम) रूप धारणकर क्षत्रियकुलका विनाश करते हुए उनके रक्तमय सलिलसे जगतको पवित्र कर संसारका सन्ताप दूर किया है। हे भृगुपतिरूपधारिन् , आपकी जय हो || ६ ||
वितरसि दिक्षु रणे दिक् पति कमनीयम् |

दश मुख मौलि बलिम् रमणीयम् ||

केशव धृत राम शरीर जय जगदीश हरे || ७ ||


अनुवाद - हे जगत् स्वामिन् श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने रामरूप धारण कर संग्राममें इन्द्रादि दिक्पालोंको कमनीय और अत्यन्त मनोहर रावणके किरीट भूषित शिरोंकी बलि दशदिशाओंमें वितरित कर रहे हैं । हे रामस्वरूप ! आपकी जय हो || ७ ||
वहसि वपुषि विशदे वसनम् जलद अभम् |

हल हति भीति मिलित यमुनआभम् ||

केशव धृत हल धर रूप जय जगदीश हरे || ८ ||


अनुवाद - हे जगत् स्वामिन् ! हे केशिनिसूदन! हे हरे ! आपने बलदेवस्वरूप धारण कर अति शुभ्र गौरवर्ण होकर नवीन जलदाभ अर्थात् नूतन मेघोंकी शोभाके सदृश नील वस्त्रोंको धारण किया है। ऐसा लगता है, यमुनाजी मानो आपके हलके प्रहारसे भयभीत होकर आपके वस्त्रमें छिपी हुई हैं । हे हलधरस्वरूप ! आपकी जय हो || ८ ||
निन्दति यज्ञ विधेः अ ह ह श्रुति जातम् |

सदय हृदय दर्शित पशु  घातम् ||

केशव धृत बुद्ध शरीर जय जगदीश हरे || ९ ||
अनुवाद - हे जगदीश्वर! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने बुद्ध शरीर धारण कर सदय और सहृदय होकर यज्ञ विधानों द्वारा पशुओंकी हिंसा देखकर श्रुति समुदायकी निन्दा की है। आपकी जय हो || ९ ||
म्लेच्छ निवह निधने कलयसि करवालम् |

धूम केतुम् इव किम् अपि करालम् ||

केशव धृत कल्कि शरीर जय जगदीश हरे || १० ||


अनुवाद - हे जगदीश्वर श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने कल्किरूप धारणकर म्लेच्छोंका विनाश करते हुए धूमकेतुके समान भयंकर कृपाणको धारण किया है । आपकी जय हो || १० ||
श्री जयदेव कवेः इदम् उदितम् उदारम् |

शृणु सुख दम् शुभ दम् भव सारम् ||

केशव धृत दश विध रूप जय जगदीश हरे || ११ ||
अनुवाद - हे जगदीश्वर ! हे श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! हे दशबिध रूपोंको धारण करनेवाले भगवन् ! आप मुझ जयदेव कविकी औदार्यमयी, संसारके सारस्वरूप,सुखप्रद एवं कल्याणप्रद स्तुतिको सुनें || ११ ||
वेदान् उद्धरते जगत् निवहते भू गोलम् उद् बिभ्रते

दैत्यम् दारयते बलिम् च्छलयते क्षत्र क्षयम् कुर्‌वते
पौलस्त्यम् जयते हलम् कलयते कारुण्यम् आतन्वते
म्लेच्छान् मूर्च्छयते दश अकृति कृते कृष्णाय  तुभ्यम् नमः || १२ ||

अनुवाद - वेदोंका उद्धार करनेवाले, चराचर जगतको धारण करनेवाले, भूमण्डलका उद्धार करनेवाले, हिरण्यकशिपुको विदीर्ण करनेवाले, बलिको छलनेवाले, क्षत्रियोंका क्षय करनेवाले, पौलस्त (रावण) पर विजय प्राप्त करनेवाले, हल नामक आयुधको धारण करनेवाले, करुणाका विस्तार करनेवाले, म्लेच्छोंका संहार करनेवाले, इस दश प्रकारके शरीर धारण करनेवाले हे श्रीकृष्ण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ || १२ ||
इति दशावतार कीर्त्तिधवलो नाम प्रथमः प्रबन्धः।

इति श्रीगीतगोविन्दे प्रथमः

Thursday, 4 July 2019

अहम् ब्रह्मस्मि

अहम् ब्रह्मास्मि भारत के पुरातन हिंदू शास्त्रों व उपनिषदों में वर्णित चार महावाक्यों में से एक है, जिसका शाब्दिक अर्थ है - "मैं ब्रहम हूँ।"

गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं - सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मतलब कि मैं सभी प्राणीयों के दिल में बसता हूँ। "अहं ब्रह्मास्मि" ये वाक्य मानव को महसूस कराता है कि जिस भगवान ने बड़े-बड़े सागर, पर्वत, ग्रह, ये पुरा ब्रह्मांड बनाया उस अखंड शक्तिस्रोत का मैं अंश हूँ तो मुझे भी उसका तेजोंऽश मुझमे भी जागृत कर उसका बनने का प्रयत्न करना चाहिए। तभी उसकी नैतिक उन्नति की शुरूवात हो जाती है। अहं ब्रह्मास्मि - यजुर्वेदः बृहदारण्यकोपनिषत् अध्याय 1 ब्राह्मणम् 4 मंत्र

Sunday, 30 June 2019

सेवा परमो धर्म:

  सेवा परमो धर्म:

समाज के अपने बंधुओं की पीड़ा और वेदना को समझने के लिए मन संवेदनशील होना चाहिए। सेवा कोई स्पर्द्धा का विषय नहीं है। किसने अधिक सेवा की यह विचार करना निम्न स्तर की भावना है। सेवा आंकड़ों में गिनने की बात नहीं, अपितु अनुभूति का विषय है। सेवा के विषय में हमें यह समझना होगा कि सेवा कभी भी योजना करके नहीं की जाती है। जब हम समाज की वेदना और पीड़ा को समझ लेते हैं, सेवा कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।

किसी की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म माना जाता है। किसी दूसरे के लिए एक छोटी-सी कोशिश करना भी सेवा मानी जाती है। हालांकि अब ज़माना लेन-देन का है, प्रॉफ़िट-लॉस का है। 'ये कर के मुझे क्या फ़ायदा होगा', इस सोच के साथ हर काम किया जाता है। सेवा के नियम इससे परे हैं। इसमें भावना दूसरे की मदद करने की होती है, आपको क्या मिलेगा, इसकी नहीं।

Saturday, 22 June 2019

भजन

।। भजन ।।
कटी जैइहै उमरिया हरी गुण गाएं से ।
हरी गुण गाएं से , प्रभु गुण गाएं से ।।
ऋषियों, मुनियों,संतों, महंतों तथा प्रभु प्रेमी भक्तों द्वारा हरी भजन ,कीर्तन करने पर विशेष महत्व बताया गया है।
भजन सुगम संगीत की एक शैली है। इसका आधार शास्त्रीय संगीत या लोक संगीत हो सकता है। इसको मंच पर भी प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन मूल रूप से यह किसी देवी या देवता की प्रशंसा में गाया जाने वाला गीत है। सामान्य रूप से उपासना की सभी भारतीय पद्धतियों में इसका प्रयोग किया जाता है। भजन मंदिरों में भी गाए जाते हैं। हिंदी भजन, जो आम तौर पर हिन्दू अपने सर्वशक्तिमान को याद करते हैं ,गाते हैं । कुछ विख्यात भजन रचनाकारों की नाम इस प्रकार है - मीराबाई , सूरदास, तुलसीदास और रसखान आदि हैं ।

भजन -कीर्तन करने से क्या होता है और इसे किस प्रकार करना चाहिए ? गोस्वामी जी कहते हैं कि आप भक्ति का कोई भी मार्ग अपनाएं , उसे श्रीनाम कीर्तन के संयोग से ही करें। इसका फल अवश्य प्राप्त होता है और शीघ्र प्राप्त होता है। सब कहते हैं कि भगवान का भजन करो.....भजन करो!  तो क्या करें हम भगवान का भजन करने के लिए ? सच्चे भक्तों के संग हरिनाम संकीर्तन करना ही सर्वोत्तम भगवद भजन है। सच्चे भक्तों के साथ मिलकर , उनके आश्रय में रहकर नाम- संकीर्तन करने से एक अद्भुत प्रसन्नता होती है , उसमें सामूहिकता होती है , व्यक्तिगत अहंकार नहीं होता और उतनी प्रसन्नता अन्य किसी भी साधन से नहीं होती , इसीलिए इसे सर्वोत्तम हरिभजन माना गया है।
        ।। जय श्री हरि ।।



Saturday, 15 June 2019

सर्वकामना पूर्ति रविवार व्रत एवं कथा


।। ऊँ श्री गणेशाय नमः ।। ऊँ श्री परमात्मने नमः ।।    

           ।। रविवार व्रत विधि एवं कथा ।।
रविवार सप्ताह का एक दिन है। यह शनिवार के बाद और सोमवार से पूर्व आता है। यह शब्द रवि से आया है, जिसका अर्थ सुर्य होता है। पंचाग के अनुसार यह सर्वकामना पूर्ति करनेवाला शुभ दिन है। रविवार की छुट्टी की शुरुआत सन 1843 में हुई थी। प्रायः इस दिन कार्यालयों में अवकाश रहता है , अतः सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रम रविवार को ज्यादा होते है।
रविवार सूर्य देवता की पूजा का वार है। यह उपवास सप्ताह के प्रथम दिवस रविवार व्रत कथा को रखा जाता है।  जीवन में सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति और शत्रुओं से सुरक्षा के लिए रविवार का व्रत सर्वश्रेष्ठ है। रविवार का व्रत करने व कथा सुनने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। मान-सम्मान, धन-यश तथा उत्तम स्वास्थ्य मिलता है। कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है।
प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त हो, स्वच्छ वस्त्र धारण कर परमात्मा का स्मरण करें।
एक समय भोजन करें।
भोजन इत्यादि सूर्य प्रकाश रहते ही करें।
अंत में कथा सुनें
इस दिन नमकीन तेल युक्त भोजन ना करें।
व्रत के दिन क्या न करें
इस दिन उपासक को तेल से निर्मित नमकीन खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। सूर्य अस्त होने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।
रविवार को सूर्योदय से पूर्व बिस्तर से उठकर शौच व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। तत्पश्चात घर के ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान सूर्य की स्वर्ण निर्मित मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद विधि-विधान से गंध-पुष्पादि से भगवान सूर्य का पूजन करें। पूजन के बाद व्रतकथा सुनें। व्रतकथा सुनने के बाद आरती करें। तत्पश्चात सूर्य भगवान का स्मरण करते हुए सूर्य को जल देकर सात्विक भोजन व फलाहार करें।
यदि किसी कारणवश सूर्य अस्त हो जाए और व्रत करने वाला भोजन न कर पाए तो अगले दिन सूर्योदय तक वह निराहार रहे तथा फिर स्नानादि से निवृत्त होकर, सूर्य भगवान को जल देकर, उनका स्मरण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करे।
शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों की कुण्डली में सूर्य पीडित अवस्था में हो, उन व्यक्तियों के लिये रविवार का व्रत करना विशेष रूप से लाभकारी रहता है। इसके अतिरिक्त रविवार का व्रत आत्मविश्वास में वृ्द्धि करने के लिये भी किया जाता है।
कथा
एक बुढिया थी, उसके जीवन का नियम था कि वह प्रत्येक रविवार के दिन प्रात: स्नान कर, घर को गोबर से लीप कर शुद्ध करती थी। इसके बाद वह भोजन तैयार करती थी, भगवान को भोग लगा कर स्वयं भोजन ग्रहण करती थी। यह क्रिया वह लम्बें समय से करती चली आ रही थी। ऎसा करने से उसका घर सभी धन - धान्य से परिपूर्ण था। वह बुढिया अपने घर को शुद्ध करने के लिये, पडोस में रहने वाली एक अन्य बुढिया की गाय का गोबर लाया करती थी। जिस घर से वह बुढिया गोबर लाती थी, वह विचार करने लगी कि यह मेरे गाय का ही गोबर क्यों लेकर आती है। इसलिये वह अपनी गाय को घर के भीतर बांधने लगी। बुढिया गोबर न मिलने से रविवार के दिन अपने घर को गोबर से लीप कर शुद्ध न कर सकी। इसके कारण न तो उसने भोजन ही बनाया और न ही भोग ही लगाया। इस प्रकार उसका उस दिन निराहार व्रत हो गया। रात्रि होने पर वह भूखी ही सो गई। रात्रि में भगवान सूर्य देव ने उसे स्वप्न में आकर इसका कारण पूछा. वृ्द्धा ने जो कारण था वह बता दिया। तब भगवान ने कहा कि :- माता तुम्हें सर्वकामना पूर्ति गाय देते हैं, भगवान ने उसे वरदान में गाय दी, धन और पुत्र दिया और मोक्ष का वरदान देकर वे अन्तर्धान हो गयें।
प्रात: बुढिया की आंख खुलने पर उसने आंगन में अति सुंदर गाय और बछडा पाया। वृ्द्धा अति प्रसन्न हो गई। जब उसकी पड़ोसन ने घर के बाहर गाय बछडे़ को बंधे देखा, तो द्वेष से जल उठी और साथ ही देखा, कि गाय ने सोने का गोबर किया है। उसने वह गोबर अपनी गाय के गोबर से बदल दिया। रोज ही ऐसा करने से बुढ़िया को इसकी खबर भी ना लगी। भगवान ने देखा कि चालाक पड़ोसन बुढ़िया को ठग रही है, तो उन्होंने जोर की आंधी चला दी। इससे बुढ़िया ने गाय को घर के अंदर बांध लिया। सुबह होने पर उसने गाय के सोने के गोबर को देखा, तो उसके आश्चर्य की सीमा ना रही। अब वह गाय को भीतर ही बांधने लगी।
उधर पड़ोसन ने ईर्ष्या से राजा को शिकायत कर दी कि बुढ़िया के पास राजाओं के योग्य गाय है, जो सोना देती है। राजा ने यह सुन अपने दूतों से गाय मंगवा ली। बुढ़िया गाय के वियोग में अखंड व्रत रखे रखा। उधर राजा का सारा महल गाय के गोबर से भर गया। सुर्य भगवान ने रात को राजा को सपने में गाय लौटाने को कहा।
प्रातः होते ही राजा ने ऐसा ही किया। साथ ही पड़ोसन को उचित दण्ड दिया। राजा ने सभी नगर वासियों को व्रत रखने का निर्देश दिया। तब से सभी नगरवासी यह व्रत रखने लगे और वे खुशियों को प्राप्त हुए।
सूर्यास्त में सूर्य भगवान की पूजा करने के बाद आरती का श्रवण व गायन करना चाहिए। रविवार के व्रत के विषय में यह कहा जाता है कि इस व्रत को सूर्य अस्त के समय ही समाप्त किया जाता है। अगर किसी कारणवश सूर्य अस्त हो जाये और व्रत करने वाला भोजन न कर पाये तो अगले दिन सूर्योदय तक उसे निराहार हीं रहना चाहिए। अगले दिन भी स्नानादि से निवृ्त होकर, सूर्य भगवान को जल देकर, उनका स्मरण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।

    ।। जय सुर्य नारायण भगवान की ।।




हिंदू साम्राज्य दिवस

आप सबको "हिन्दू साम्राज्य दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएं!💐

आप सभी को पता हैं कि - आज हम यहाँ "हिन्दू साम्राज्य दिवस" मना रहे है. मैं आपको एक छोटी सी बात बताना चाहता हूँ. कल मैंने फेसबुक पर "हिन्दू साम्राज्य दिवस" पर एक लेख लिखा था . उसे देखकर कुछ मित्रों ने प्रश्न किया कि – रोज डे, चाकलेट डे, वैलेंटाइन डे, के बारे में तो सुना है, लेकिन यह "हिन्दू साम्राज्य दिवस" कब से शुरू हो गया?

इस प्रश्न को देखकर अत्यंत दुःख हुआ कि - हमारी युवा पीढ़ी किस और जा रही है? निरर्थक विदेशी दिवस तो याद हैं लेकिन जिन दिवस पर हमें अपने देश और धर्म पर गर्व करना चाहिये, वो हमको पता तक नहीं हैं. आप सभी को पता ही है कि - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा 6 त्यौहार राष्ट्रीय स्तर पर मनाये जाते है.

हमारे यह 6 त्यौहार है : वर्ष प्रतिपदा, हिन्दू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा, रक्षा बंधन, विजय दशमी और मकर संक्राति. इन सभी त्योहारों को चुनने के पीछे भी अलग अलग कारण है. लेकिनं आज हम उन पर कोई चर्चा नहीं करेंगे बल्कि अपना सारा ध्यान केवल "हिन्दू साम्राज्य दिवस" पर ही देना चाहते हैं.

आज भारतीय कैलेण्डर के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ला की त्रियोदशी है. सन 1674 में आज के दिन ही छत्रपति शिवाजी महाराज का राजतिलक हुआ था. एक प्रश्न यह भी उठता है कि - भारत में अनेकों महान राजा हुए हैं तब "हिन्दू साम्राज्य दिवस" मनाने के लिए केवल शिवाजी के राजतिलक का दिन ही क्यों चुना गया ? इसका भी एक विशेष कारण है :

उस समय लगभग सारे भारत पर मुघलों का राज था. जिन छोटी रियासतों में हिन्दू राजा थे, वो भी दिल्ली की मुग़ल सल्तनत के अधीन ही थे. ऐसे समय में एक साधारण बालक ने असाधारण क्षमता दिखाते हुए. एक स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की. शिवाजी का जीवन प्रेरणा देता है कि - जो देश के लिए कुछ करना चाहता है उसका रास्ता कोई नहीं रोक सकता.

जिस तरह हम प्रतिदिन शाखा लगाते हैं, शिवाजी महाराज ने उसी तरह से अपने साथियों को इकठ्ठा करना प्रारम्भ किया था. वहां पर वे खेलकूद करते और देश की स्थिति पर बिचार करते थे. उनकी माता जीजाबाई उनको रामायण, महाभारत, विक्रमादित्य, प्रताप "महान", आदि की कहानिया सुनाती थी, जिनको शिवाजी अपने साथियों को जाकर सुनाते थे.

वे महाराणा प्रताप "महान" के जीवन से बहुत प्रभावित थे, लेकिन उन्होंने उनके जीवन से यह सबक भी सीखा कि - केवल महान योद्धा होना और बहादुरी से लड़ते हुए मरना ही काफी नहीं है बल्कि युद्ध में जीतना सबसे ज्यादा जरुरी है. इसके लिए उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की तकनीक विकसित की. जिस गुरिल्ला युद्ध को लोग माओ की तकनीक बताते है वो उनकी तकनीक थी.

उन्होंने युद्ध की ऐसी प्रणाली बनाई कि - शत्रु पर हमला करो, उसको अधिक से अधिक नुकशान पहुँचाओ और फिर शीघ्रता से बहा से हट जाओ. इस तकनीक के सहारे उन्होंने सैकड़ों लड़ाईया जीती. अपने साथियों के साथ उन्होंने 1655 में बीजापुर की कमज़ोर सीमा चौकियों पर कब्ज़ा करना शुरू किया.

जब उनको छोटी-छोटी विजय मिलना प्रारम्भ हुई, तो उनका भी आत्मविश्वास बढ़ने लगा तथा अन्य लोग भी उनके साथ आने लगे. शिवाजी को सबक सिखाने के लिए बीजापुर के सुलतान ने कई बार कोशिश की, परन्तु शिवाजी हर वार विजयी रहे. अफजल खान का बध करने के बाद तो पूरे देश में उनके नाम का डंका बजने लगा था.

धीरे-धीरे बहुत बड़ा क्षेत्र शिवाजी महाराज के अधिकार क्षेत्र में आ गया. उनकी माता जीजाबाई और समर्थ गुरु रामदास चाहते थे कि - शिवाजी का राजतिलक इतना भव्य होना चाहिए कि - मुग़लो की आँखे चकाचौंध हो जाएँ, साथ ही अन्य छोटे हिन्दू राजाओं में भी स्वाभिमान की भावना जाग्रत हो. इसलिए उनके राजतिलक का भव्य आयोजन किया गया.

उनके राजतिलक को शिवाजी का राजतिलक नहीं कहा गया, बल्कि एक हिन्दू राजा का राजतिलक कहा गया. उन दिनों रियासतों में जितने भी हिन्दू राजाओं के राजतिलक होते थे, वो भी मुग़ल राजाओं की अनुमति से होते थे, यह पहला राजतिलक था जो मुगलिया सल्तनत को चुनौती देते हुए हो हुआ था. इसके बाद अनेकों छोटे राजा, शिवाजी के साथ आ गए थे.

शिवाजी महाराज का राज, पुरी तरह से हिन्दू जीवन शैली पर आधारित था, जिसमे समस्त प्रजा को एक परिवार और राजा को परिवार का मुखिया माना जाता था. शिवाजी के राजतिलक के बाद, देश के अनेको हिस्सों में मुगलों के खिलाफ आजादी की लडाइयां प्रारम्भ हो गई. पंजाब, राजस्थान, बुंदेलखंड, मालवा, गुजरात की अनेकों हिन्दू रियासतों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया.

इसीलिए संघ ने अपना त्यौहार "हिन्दू साम्राज्य दिवस" मनाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के राजतिलक का दिन चुना. यहाँ शाखा में प्रतिदिन उनकी ही तरह खेलकूद के साथ साथ राष्ट्रवाद सिखाया जाता है, देश के प्रति समर्पण सिखाया जाता है और देश के लिए लड़ने योग्य बनना सिखाया जाता है.

आज का दिन हिदुओं के लिए बहुत ही गौरवशाली दिन है. अब मैं और ज्यादा समय न लेते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ. आपसे यही निवेदन है कि भारतीय संस्क्रती से जुड़े हुए त्योहारों को गर्व से मनाएं. इन त्योहारों को मनाने से हमें राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है.

आखिर में आप सब मेरे साथ उद्घोष करेंगे
जय शिवा सरदार की, जय राणा प्रताप की,
वन्दे मातरम, भारत माता की जय .

Tuesday, 1 January 2019

आर्यावर्त

ओ३म् तत्सत श्री ब्रह्मणो द्वितीयप्रहराद्र्धे वैवस्वतमन्वन्तरेअष्टाविंशतितमेकलियुगे कलिप्रथमचरणेआर्यावर्तान्तरैकदेशान्तर्गते जन्बूद्वीपेभरतखण्डे … अत्रेदं कार्यं कृतं क्रियते वा।’
 इस संकल्प वाक्य में भरत-खण्ड नाम का होना भी हमारे देश के भारत नाम की महाभारत काल से पूर्व व प्राचीनता का प्रमाण हैं। इस वाक्य में आर्यावर्त के साथ-साथ इस देश को जम्बूद्वीप और भरत खण्ड कहा गया है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि हमारा देश भारत जम्बूद्वीप के अन्तर्गत था और संसार में अन्य अनेक महाद्वीप थे। महर्षि दयानन्द ने इस संकल्प वाक्य का दिनांक 19-20 मार्च सन् 1877 ई. को चांदापुर के मेले के अवसर पर ईसाई मत के पादरी स्काट साहब, पादरी नोबिल साहब, पादरी पार्कर साहब और पादरी जान्सन साहब तथा मुसलमानों की ओर से मौलवी मुहम्मद कासम साहब, सैयद अब्दुल मंसूर साहब तथा आर्यधर्म की ओर महर्षि दयानन्द तथा मुन्शी इन्द्रमणि के मध्य हुए शास्त्रार्थ में भी उल्लेख किया है जिससे सृष्टि, वेदोत्पत्ति, मनुष्योत्पत्ति तथा सृष्टिकाल 1,96,08,53,114 वर्षों का ज्ञान शास्त्रार्थ के प्रतिभागियों को कराया जा सके।

हम सब जानते हैं कि रामायण एवं महाभारत हमारे इतिहास के प्राचीन ग्रन्थ हैं। यह ग्रन्थ हमारे ऋषियों, महर्षि बाल्मिकी और महर्षि वेदव्यास जी की रचनायें है। ऋषि ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए तथा चारों वेदों के पूर्ण जानकार योगी होते हैं। इस योग्यता को प्राप्त करने के बाद वह जो कहा करते थे व लिखते थे वह पूर्ण सत्य हुआ करता था। महाभारत का युद्ध आज से 5,150 वर्ष पूर्व कुरूक्षेत्र की भूमि पर पाण्डवों व कौरवों के बीच हुआ था। इसके कुछ समय बाद महर्षि वेदव्यास जी ने “भारत” नाम से इस युद्ध पर आधारित एक इतिहास ग्रन्थ की रचना की जिसमें 24,000 श्लोक थे। यह बात महाभारत ग्रन्थ में स्वयं महर्षि वेदव्यास जी की कही व लिखी हुई है। समय के साथ इसमें प्रक्षेपों द्वारा विस्तार होता गया और अब महाभारत में 1 लाख 25 हजार के लगभग श्लोक मिलते हैं। यहां प्रश्न मात्र यह है कि महर्षि वेदव्यास ने इस इतिहास ग्रन्थ का नाम “भारत” ही क्यों रखा? इसका कारण यही हो सकता है उन दिनों देश का नाम आर्यावत्र्त के साथ-साथ “भारत” प्रसिद्ध था। अतः महर्षि वेदव्यास जी ने अपने इतिहास के इस प्रसिद्ध ग्रन्थ को भारत नाम से सुशोभित किया। उनका उद़देश्य था कि देश के राजनैतिक व सामाजिक वातावरण के साथ उस महायुद्ध का ज्ञान भी समकालीन व भावी पीढि़यों को भली भांति हो सके। हमारे ऋषियों की यह विशेषता दिखाई देती है कि वह अपने ग्रन्थों के सार्थक नाम ही रखते थे। उपनिषद, दर्शन व ब्राह्मण आदि ग्रन्थों के नाम देख कर यह अनुमान सत्य सिद्ध होता है।

तुलसीदास

  “पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी धरयो शरीर||" तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा...