रक्षाबंधन उत्सव

भारत माता की जय

Monday, 1 May 2017

राजा हरिश्चंद्र

raja harishchandra 

 राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के इक्क्षवाकू वंश (सूर्य वंश) के प्रसिद्ध त्रेता युग के राजा थे. इनके पिता जी का नाम सत्यव्रत था. इनकी पत्नी का नाम तारा और पुत्र का रोहित था।इनके गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी थे। इनके राज्य में सब जगह सुख और शांति थी।सभी पौराणिक ग्रंथो में हरिश्चंद्र के सत्य व्रत की कथा का प्रभावकारी वर्णन मिलता है। कहा जाता कि सपने में भी वे जो बात कह देते थे उसका पालन निश्चित रुप से करते थे। उनके बारे में ये लोकोक्ति कही जाती है :-

चंद्र टरै सूरज टरै ,टरै जगत व्यव्हार। पै दृढ़व्रत श्री हरिश्चंद्र का , टरै  न सत्य विचार।।

कथाओं में वर्णन आता है हरिश्चंद्र बहुत धार्मिक और दानी प्रवृति के राजा थे। इनके यज्ञ और दान कर्म से पृथ्वी लोक और देव लोक में चर्चा का विषय बन गया।  कहते है एक बार देवराज इंद्र की सभा लगी और उस सभा में विशिष्ट जी और विश्वामित्र जी भी विरजमान थे।  जैसा की सर्वविदित है देवराज इंद्र हमेशा अपने सिंघासन से ससंकित रहने वाले देवता है।  कोई उनका सिंघासन न छीन ले इस भय से विश्वामित्र जी से राजा हरिश्चन्द्र के सत्य की परीक्षा लेने के लिए विश्वामित्र जी मना लिया और वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी से कहा हम आपकी परीक्षा के बीच में नहीं आएंगे अगर हमारा शिष्य पास हुआ तो अपनी तपस्या का फल उसे आपको देना पड़ेगा।

एक बार राजा हरिश्चंद्र की सभा में विश्वामित्र जी आये और उनसे उनके संपूर्ण राज्य को दान के रूप में मांग लिया और पांच सौ स्वर्ण मुद्रा दक्षिणा रूप में माँगा ,राजा ने कहा की " पांच सौ क्या आप चाहे जितनी स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिये। इस पर विश्वामित्र जी हॅसने लगे और राजा को याद दिलाये कि सारा राजपाठ के साथ राज्य को कोष भी वे दान कर चुके है और दान की हुई वस्तु को दुबारा दान नहीं दिया जाता। राजा हरिश्चंद्र ने पांच सौ स्वर्ण मुद्राए देने के लिए स्वीकार्य किया। राजा ने विश्वामित्र से समय माँगा , विश्वामित्र ने समय तो दे दिया किन्तु चेतावनी भी दी कि यदि समय पर दक्षिणा न मिली तो श्राप देकर भस्म कर देंगे , राजा को भस्म होने का भय तो नहीं था किन्तु समय से दक्षिणा न चुका पाने पर अपने अपयश का भय अवश्य था।  

राजा हरिश्चंद्र ने अपना राज्य विश्वामित्र को सौपकर वे अपना राज्य विश्वामित्र को सौंप कर अपनी पत्नी व पुत्र को लेकर काशी चले आये. काशी में राजा हरिश्चंद्र ने कई जगहों पर अपने को बेचने का प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली. रानी और पुत्र  को काशी के एक साहूकार ने खरीद लिया परन्तु पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं नहीं प्राप्त हुई तो अपने को भी बेचने का प्रयास किया। शाम तक राजा को श्मशान घाट के मालिक डोम  ने ख़रीदा। इस प्रकार राजा ने प्राप्त धन से विश्वामित्र की दक्षिणा चूका दी।

इस प्रकार सत्य के लिए राजा हरहरिश्चंद्र ने रानी तथा अपने पुत्र को बेंच कर अपना धर्म निभाया , जो राजा थे सत्य की रक्षा के लिए अब डोम के यहाँ श्मशान घाट कर वसूलने का कार्य करने लगे और उधर रानी और पुत्र रोहित साहूकार की सेवा में लग गए।  एक दिन सेठानी ने पूजा के लिए रोहित को पुष्प चयन के लिए भेजा और बगीचे में रोहित को सांप ने डस लिया और रोहित का देहांत हो गया। विधि का विधान देखिये रानी अपने पुत्र को लेकर श्मशान घाट पर ले गयी अंतिम संस्कार के लिए, जहा पर कर वसूलने का कार्य राजा हरिश्चंद्र कर रहे थे।राजा ने अपने धर्म के पालन के लिए बिना कर दिए अंतिम संस्कार करने से मना कर दिए।  रानी और राजा ने एक दूसरे को पहचान लिया अपने पुत्र को भी पहचान लिया पर अपने धर्म पर अटल रहे , रानी ने कर के रूप में अपना आँचल फाड़कर जैसे देना चाहा उसी समय स्वयं ईश्वर प्रकट हो गए और उन्होंने राजा से कहा -" हरिश्चंद्र ! तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है।  तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है , तुम इतिहास में अमर रहोगें। "

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हरिश्चंद्र ने ईश्वर से कहा -"अगर वाकई मेरी कर्तव्यनिष्ठा और सत्य के प्रति समर्पण सही है तो कृपया इस स्त्री के पुत्र को जीवनदान दीजिए"। इतने में ही रोहिताश्व जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने भी हरिश्चंद्र का राजपाठ उन्हें वापस लौटा दिया।

सत्यमेव जयते 
पंडित राकेश शुक्ल  शास्त्री

Thursday, 27 April 2017

BHAGAVAN PARASHURAM

                                                          भगवान परशुराम 



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 परिचय 
भगवान परशुराम जी अहंकारी और दुष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्द है।  वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार - प्रसार करना चाहते थे . कहा जाता है भारत के अधिकतर गांव उन्ही के द्वारा बसाये गए।  वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकरी संतानों में से एक थे , जो हमेशा गुरु और माता - पिता की आज्ञा का पालन करते थे।  परशुराम जी का रामायण , महाभारत ,भागवत पुराण और कल्कि पुराण आदी अनेक ग्रंथो में उल्लेख किया गया है।   वे ब्राह्मण कुल के थे पर उनका कर्म क्षत्रिओं के थे।  बाल्यकाल में ही वे अपनी माता से अधिकांश विद्यायें सिख ली थी वे पशु पक्छियों की भाषा को समझते थे और उनसे बातें करते थे। खूंखार पशु भी उनके स्पर्श से उनके मित्र बन जाते थे। 
जन्म

परशुराम भगवान विष्णु के छठे आवेशावतार है , ये चिरंजीवी होने से कल्पांत तक स्थायी है।  इनका प्रादुर्भाव वैशाख  मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था , इसलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया कही जाती है।इनके पिता का नाम यमदग्नि और माता का रेणुका था।  पांच भाइयों में सबसे छोटे थे , रुक्मवान , सुखेन , वसु , विश्वानस और परशुराम लेकिन गुणों में सबसे आगे थे।      
 माता का वध 
 एक दिन गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता हुआ देख हवन के लिए गंगा तट  पर जल लेने गयी रेणुका आसक्त हो गई और कुछ देर तक वही रुक गयी।  हवन का समय बीत जाने पर मुनि यमदग्नि बहुत क्रोधित हुए आर्य मर्यादा के विरोध आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के लिए दंड स्वरुप सभी पुत्रो को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी , लेकिन मोहवश किसी पुत्र ने ऐसा नहीं किया।  तब मुनि ने उन्हें श्राप दे दिया और उनकी विचार शक्ति का नाश हो गयी ।  अन्य भाइयों द्वारा ऐसा न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित  परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिर धड़ से अलग कर दिया।  यह देखकर महर्षि यमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और वरदान मांगने के लिया कहा तो उन्होंने तीन वर मांगे -१. माँ पुनः जीवित हो जाए २. उन्हें मरण की स्मृति न रहे ३.भाई चेतना  युक्त हो जाये।  महर्षि यमदग्नि ने उन्हें तीनो वरदान दे दिए। माता पुनः जीवित हो गयी।

 पिता की हत्या और परशुराम का प्रतिशोध 
कथा है कि हैहय वंश के अधिपति कार्त्यवीर्य अर्जुन ( सहस्त्रार्जुन) ने कठिन तप के द्वारा भगवान दत्तात्रेय को खुश कर एक हजार भुजाये और युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश जंगल में शिकार करते वह यमदग्नि जी के आश्रम पर जा पंहुचा।  देवराज इंद्रा के द्वारा दी हुई कपिला कामधेनु ( गाय ) की सहायता से हुए सभी सैनिको का आथित्य सत्कार पर लोभ के कारण यमदग्नि की अनादर करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर मुनि की हत्या करके चला गया। इस पर क्रोधित होकर परशुराम ने अपने फरसे के प्रहार से उसकी सारी भुजाए काट डाली व शिर को धड़ से अलग कर दिया और रेणुका माता पति की चिता की अग्नि में प्रवेश कर सती हो गयी।  इस कांड से क्रोधित परशुराम ने पूरी ताकत से महिष्मति नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया।  इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पुरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विकाश किया।  यही नहीं अपने पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रो के रक्त से किया।  अंत में महर्षि रीचिक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका। इसके बाद उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सातों द्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी और महेंद्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे। 

उपसंहार 
रामायण और महाभारत काल में भी भगवान परशुराम का उल्लेख मिलता है। उन्होंने सैन्य शिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी है. लेकिन कुछ अपवाद भी है जैसे भीष्म और कर्ण।  कर्ण की कथा आतीं है जिसमे कर्ण भगवान परशुराम की सेवा कर रहा था और उसकी जंघा में  एक बिच्छू ने घाव कर दिया परन्तु विश्राम भंग नहीं किया।  अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर एक ब्राह्मण पुत्र में इतनी सहनशक्ति नहीं हो सकती कि वह बिच्छु का दंश सहन कर सके।  कर्ण के झूठ बोलने पर उन्होंने श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी तो वह उसे काम नहीं आएगी। कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के दसवे अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें शिक्षा देगें वे ही कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके उनके दिव्यास्त्र को प्राप्त करने के लिए कहेगे। 

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।

विश्ववन्द्य महाबाहु भगवान परशुराम के बारे अनगिनत कथानक उपलब्ध है वे आज भी हमारे आप के बीच विद्यमान है हमें उनके आदर्शो पर चलना चाहिए , भगवान परशुराम जी जीवन से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए और सदैव अन्याय , अत्याचार का पूरा विरोध करना चाहिए।

उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना ना कि अपनी प्रजा से आज्ञा का पालन करवानां। 

अंत में सभी सनातनियो , श्रेष्ठों , तथा मित्रो को भगवान परशुराम की जयंती की  बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाये !!!

 जय भगवान परशुराम जी की 

पंडित राकेश शुक्ल शास्त्री



































Sunday, 23 April 2017

विधि निषेध

                                                       विधि और निषेध 

हम कानून से घिरी दुनिया में रहते  हैं. भारतीय राज्य आपकी जन्मजात नागरिकता का सम्मान करते हुए तदनुरूप आपके जीवन के अधिकार के साथ दूसरों के साथ आपकी स्वतंत्रता, समानता और गरिमा का आदर करता है. अप्रैल 2010  के बाद से राज्य ने प्रत्येक 6  से 14 साल के हरेक बाल नागरिक के लिए आठ वर्ष की बुनियादी शिक्षा का भरोसा दिया है.भारतीय संविधान के अनुसार विधि और निषेध का पालन करना हर भारतीय का मूल कर्त्तव्य है.

विधि :- साधारण रूप से विधि को व्यवस्था आदि का तरीका या प्रणाली ,शास्त्र सम्मत व्यवस्था या दिशा निर्देश को कह सकते है। जैसे - जीवन, स्वतंत्रता, समानता, गरिमा, शिक्षा आदि आपके अधिकार संवैधानिक कानून के दायरे में आते है।

निषेध :- मना करने की क्रिया या भाव ऐसा नियम या आज्ञा जिसमे किसी बात की मनाही हो। जैसे- चोरी न करना , बल मजदूरी न करना आदि। 

धन्यवाद,
जय श्री राम
राकेश शुक्ल शास्त्री


Sunday, 11 December 2016

Ram Nam Sukhdai

भज मन राम चरण सुखदाई ,भजन कर भाई ये दुनियां दो दिन की 

अर्थात श्री राम जी कमलवत चरण सदा सर्वदा सुखों के देने वाले है, हे भाई श्री राम नाम को भज यह महामंत्र है क्योंकि राम नाम सभी सुखों ( दैहिक , दैविक और भौतिक ) प्रदान करने वाला है। श्री  तुलसीदास जी महाराज श्री रामचरित मानस में कहते है:-
नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेहूँ जौं चाहसि उजियार ।।

यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुखरूपी द्वार की जीभरूपी देहली पर राम नाम रूपी मणि दीपक को रख । राम नाम मणि है । राम नाम परम श्रेष्ठ है । 

अतः श्री राम नाम को भजन चाहिए जो सभी सुखों को देने वाला है क्योकि यह सृस्टि नाशवान है।  
इसलिए कहते है ;- भज मन राम चरण सुखदाई
जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।

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जय जय श्री सीताराम

Monday, 15 February 2016

देशद्रोही को सबक

भारत देश में आज कुछ राष्ट्र विरोधी शक्तियां उभर कर सामने आ रही है जो अपने निजी स्वार्थ के लिए देश को खंडित करने का कुत्सित प्रयास कर रही है।  यह ऐसी शक्तियां है जो विदेशी आतंकियों से गुप्त रूप में समर्थित है।  इनकी पहचान करना बहुत जरुरी है , इसके लिए भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को इसके मूल में जाकर कौन देशद्रोही जे एन यु में हिंदुस्तान विरोधी नारे लगाने के प्रेरित किया और कौन कौन इन आतंकियों से  मिला है।

भारत सरकार से अनुरोध है कि इन दुष्ट राष्ट्रद्रोहियों के ऊपर समुचित कार्यवाही एवं सजा सुनिश्चित करे।

जय हिन्द
जय भारत
जय हिंदुस्तान
जय सनातन धर्म
सनातन धर्म प्रहरी
राकेशुक्ला शास्त्री  

Sunday, 14 February 2016

अपनी संस्कृति अपना समाज

नमस्कार ,
                  आज कल हिन्दू समाज में पश्चिमी सभ्यता इतना हावी है की हम अपने किसी भी पौराणिक त्यौहार , पूजा , समारोह में पश्चिमी सभ्यता का इतना अंधानुकरण कर रहे है की हम अपनी परम्परां को जैसे भूल गए है।

आज कल पूरा हिन्दू समाज माँ सरस्वती जी की पूजा लोग बड़ी श्रद्धा से मना रहे है। आज विसर्जन था , एक तरफ सडको पर ट्रक पर माँ सरवती की मूर्ति है तो दूसरी तरफ डी जे  साउंड पर फूहड़ गीत बज रहे है।

हमारा सिर्फ यह ब्लॉग लिखने का मात्र यही उद्देश्य है की हम अपनी सनातन परंपरा को उचित ढंग से निभाए नहीं तो एक कहावत है " अगर किसी राष्ट्र को नष्ट करना हो तो उसकी संस्कृति और आहार को बिगड़ दो। "
शायद हमारे भारत वर्ष में आज तक यही होता आया है।

हम श्री राम और कृष्ण को संतान है हम कहा भटक गए है।  
जागो अपने आप को पहचानो , हम आर्य संतान है।

सनातन धर्म प्रहरी
राकेशुक्ला  शास्त्री

तुलसीदास

  “पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी धरयो शरीर||" तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा...