रक्षाबंधन उत्सव

भारत माता की जय

Friday, 23 February 2018

जय बजरंगबली

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।                                                           
           ।। घनाक्षरी ।।

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-
अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,
क्रमको न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,
लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैधौं बीररस, धीरज कै, साहस कै,
तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो॥

 भावार्थ - सूर्यभगवान के समीप में हनुमानजी विद्या पढ़ने के लिये गये, सूर्यदेव ने मन में बालकों का खेल समझकर बहाना किया (कि मैं स्थिर नहीं रह सकता और बिना आमने-सामने के पढ़ना-पढ़ाना असम्भव है)। हनुमानजी ने भास्कर की ओर मुख करके पीठ की तरफ से पैरों से प्रसन्नमन आकाशमार्ग में बालकों के खेल के समान गमन किया और उससे पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का भ्रम नहीं हुआ। इस अचरज के खेल को देखकर इन्द्रादि लोकपाल, विष्णु, रूद्र और ब्रह्मा की आँखें चौंधिया गयीं तथा चित्त में खलबली-सी उत्पन्न हो गयी। तुलसीदास जी कहते हैं-सब सोचने लगे कि यह न जाने बल, न जाने वीररस, न जाने धैर्य, न जाने हिम्मत अथवा न जाने इन सबका सार ही शरीर धारण किये हैं ?

   ।। जयतु सनातन धर्मः ।।
                  ।। जय श्री राम ।।जय बजरंगबली

Thursday, 22 February 2018

आरती कैसे हो?

हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म-कांड के बाद भगवान की आरती उतारने का विधान है। देखने में आता है कि प्रत्येक व्यक्ति जानकारी के अभाव में अपनी इच्छानुसार भगवान की आरती उतारता है। जबकि भगवान की आरती उतारने के भी कुछ विशेष नियम होते हैं।

आरती के दो भाव है जो क्रमश: 'आरात्रिक अथवा ‘नीराजन’ और ‘आरती’ शब्द से व्यक्त हुए हैं। नीराजन (नि:शेषेण राजनम् प्रकाशनम्) का अर्थ है- विशेष रूप से, नि:शेष रूप से प्रकाशित हो उठे चमक उठे, अंग-प्रत्यंग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाय जिसमें दर्शक या उपासक भलीभाँति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंगम कर सके।

दूसरा ‘आरती’ शब्द (जो संस्कृत के आर्तिका प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है- अरिष्ट) विशेषत: माधुर्य- उपासना से संबंधित है। ‘आरती वारना’ का अर्थ है- आर्ति-निवारण, अनिष्ट से अपने प्रियतम प्रभु को बचाना।

आरती कैसे करे

आरती में पहले मूलमन्त्र (जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया हो, उस मन्त्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगारे, शंख, घड़ियाल आदि महावाद्यों के तथा जय-जयकार के शब्द के साथ शुभ पात्र में धृत से या कपूर से विषम संख्या की (1,5,7,11,21,101) अनेक बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिये-विषम संख्याओ में तीन की संख्या वर्जित है.

तत्श्च मूलमन्त्रेण दत्वा पुष्पांजलित्रयम्।
महानीराजनं कुर्यान्महावाद्यजयस्वनै:।।
प्रज्वलयेत् तदर्थं च कर्पूरेण घृतेन वा।
आरार्तिकं शुभे पात्रे विषमानेकवर्तिकम्।।

साधारणत: पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे ‘पंचप्रदीप’ भी कहते हैं। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कपूर से भी आरती होती है। पद्मपुराण में आया है-

कुंकुमागुरुकर्पूरघृतचन्दननिर्मिता:
वर्तिका: सप्त वा पंच कृत्वा वा दीपवर्त्तिकाम्।।
कुर्यात् सप्तप्रदीपेन शंखघण्टादिवाद्यकै:।

‘कुंकुम, अगर, कपूर, घृत और चन्दन की सात या पाँच बत्तियाँ बनाकर अथवा दिये की (रुई और घी की) बत्तियाँ बनाकर सात बत्तियों से शंख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुए आरती करनी चाहिये।’

‘आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान् की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाये, दो बार नाभि देश में, एक बार मुख मण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमाये’इl तरह चौदह बार आरती घुमानी चाहिये.
जिस देवता की आरती करनी होती है, उस देवता का बीज मंत्र, स्नान थाली, नीराजन थाली, घण्टिका और जल कमण्डलु आदि पात्रों पर चन्दन आदि से लिखना चाहिए और फिर आरती द्वारा भी बीज मंत्र को देव प्रतिमा के सामने बनाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति तत्तद देवताओं के बीज मंत्रों का ज्ञान न रखता हो तो सभी देवताओं के लिए 'ऊं' को लिखना चाहिए। अर्थात आरती को इस प्रकार घुमाना चाहिए, जिससे 'ऊं' के वर्ण की आकृति बन जाए।
 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ नमो नारायण
शुभ संध्या जय श्री हरि
आरती कैसे करें?

Tuesday, 20 February 2018

यक्ष प्रश्न

                     ।। ॐ श्री परमातमने नमः ।।

यक्ष प्रश्न: जीवन का उद्देश्य क्या है?

युधिष्ठिर उत्तर: जीवन का उद्देश्य उसी
चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
उसे जानना ही मोक्ष है।

टिप्पणी : बहुत से लोगों का उद्देश्य धन कमाना हो
सकता है। धन से बाहर की समृद्धि प्राप्त हो
सकती है, लेकिन ध्यान से भीतर
की समृद्धि प्राप्त होती है। मरने के बाद
बाहर की समृद्धि यहीं रखी
रह जाएगी लेकिन भीतर की
समृद्धि आपके साथ जाएगी। महर्षि पतंजलि ने मोक्ष
तक पहुंचने के लिए सात सीढ़ियां बता रखी
है:- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान।
ध्यान के बाद समाधी या मोक्ष स्वत: ही
प्राप्त होता है।

                         यक्ष प्रश्न।। जय श्रीमन्नारायण ।।

Sunday, 18 February 2018

शिव भजन

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।। 
       हर हर महादेव     ।। शिव भजन।।

शिव शंकर को जिसने पूजा उसका ही उद्धार हुआ।
अंत काल को भवसागर में उसका बेडा पार हुआ॥

भोले शंकर की पूजा करो,
ध्यान चरणों में इसके धरो।
हर हर महादेव शिव शम्भू।
हर हर महादेव शिव शम्भू॥

नाम ऊँचा है सबसे महादेव का,
वंदना इसकी करते है सब देवता।
इसकी पूजा से वरदान पातें हैं सब,
शक्ति का दान पातें हैं सब।

नाथ असुर प्राणी सब पर ही भोले का उपकार हुआ।
अंत काल को भवसागर में उसका बेडा पार हुआ॥
               ।। जयतु सनातन धर्मः ।।
                  ।। हर हर महादेव ।।

Saturday, 17 February 2018

भरोसा

राम भरोसे।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।                                                           
              ।। भरोसा ।।

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।

मित्रों आज के इस कलियुग में व्यक्ति के ऊपर एक दूसरे के प्रति इतना अविश्वास हों गया है कि अपने पराये हो कर रह गए और पराये अपने परंतु यह अकाट्य सत्य है अंत में अपने ही अपने होते हैं । भरोसा ( विश्वास ) यह ऐसा पहलु है कि राजा को भिखारी और भिखारी को राजा बना देता है ।

भरोसे पर दुनिया का सारा कार्यक्रम चलता है, चाहें व्यापार हों या जीवन का व्यवहार हों ! भरोसा पर ना जाने कितनी कथाएं और लेख आप को मिल जाएंगे, पर मेरा कहना है कि भरोसे पर दुनिया टिकी है , अतः ऐसा कार्य ना करें कि किसी का भरोसा ना टुटे, एक दूसरे पर भरोसा ही जीवन का आधार है।

भरोसा अगर करना है तो परमात्मा का पर करीए जिनकी कृपा से हमारी सांसें चलतीं है,पंक्षी चहचहाती है, पेड़-पौधों पर फुल और फल आते हैं और सारे जगत के क्रिया कलाप हो रहें हैं ।

             ।। जयतु सनातन धर्मः ।।
                  ।। जय श्री राम ।।

जो करते रहोगे भजन

प्रातः स्मरणीय परम पूज्य संत प्रेममुर्ति श्री प्रेमभुषण जी महाराज के द्वारा गाया गया अनुपम एवं अविस्मरणीय भजन आप सभी मनन एवं चिंतन करें।
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे ।
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे।।
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे ।
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे ।।

अगर उनसे मिलने की दिल में तमन्ना
अगर प्रभु से मिलने की दिल में तमन्ना
अगर हरी से मिलने की दिल में तमन्ना
करो शुद्ध अन्तःकरन धीरे धीरे
करो शुद्ध अन्तःकरन धीरे धीरे

जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे ।
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे ।।

कोई काम दुनिया में मुश्किल नहीं है
जो करते रहोगे यतन धीरे धीरे
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे ।
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे।।

करो प्रेम से भक्ति सेवा हरी की
करो प्रेम से भक्ति पूजा हरी की
तो मिल जायेगा वो रतन धीरे धीरे

जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे ।
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे ।।
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे ।
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे ।।

जय हो अवधबिहारी की
सजन धीरे धीरे

Friday, 16 February 2018

जय श्री राम

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।                       

           
राम राम
घनाक्षरी

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-

अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो।

पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,

क्रमको न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो॥

कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,

लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।

बल कैधौं बीररस, धीरज कै, साहस कै,

तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो॥



भावार्थ - सूर्यभगवान के समीप में हनुमानजी विद्या पढ़ने के लिये गये, सूर्यदेव ने मन में बालकों का खेल समझकर बहाना किया (कि मैं स्थिर नहीं रह सकता और बिना आमने-सामने के पढ़ना-पढ़ाना असम्भव है)। हनुमानजी ने भास्कर की ओर मुख करके पीठ की तरफ से पैरों से प्रसन्नमन आकाशमार्ग में बालकों के खेल के समान गमन किया और उससे पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का भ्रम नहीं हुआ। इस अचरज के खेल को देखकर इन्द्रादि लोकपाल, विष्णु, रूद्र और ब्रह्मा की आँखें चौंधिया गयीं तथा चित्त में खलबली-सी उत्पन्न हो गयी। तुलसीदास जी कहते हैं-सब सोचने लगे कि यह न जाने बल, न जाने वीररस, न जाने धैर्य, न जाने हिम्मत अथवा न जाने इन सबका सार ही शरीर धारण किये हैं ? ॥

।। जयतु सनातन धर्मः ।।
   ।। जय श्री राम ।।

तुलसीदास

  “पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी धरयो शरीर||" तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा...