रक्षाबंधन उत्सव

भारत माता की जय

Sunday, 5 November 2017

* दैनिक सत्कर्म*

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।
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‌                 * दैनिक सत्कर्म *
                     तीसरी पोस्ट -
आदरणीय मित्रों प्रातः काल निम्न श्लोकों का पाठ करने से बहुत कल्याण होता है।
देवी स्मरण--
प्रातः स्मरामि शरदिन्दुकरोज्जवलाभां,
सद्रत्नवन्मकरकुण्डलहारभूषाम्।
दिव्यायुधोर्जितसुनीलसहस्त्रहस्तां,
रक्तोत्पलाभचरणां भवतीं परेशाम्।।
शरत्कालीन चन्द्रमा के समान उज्जवल आभावाली, उत्तम रत्नों से जटित मकरकुण्डलों तथा हाथों से सुशोभित,दिव्य आयुधों से दीप्त सुंदर नीले हजारों हाथों वाली, लाल कमल की आभा युक्त चरणों वाली भगवती दुर्गा देवी का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूं।
सुर्य स्मरण--
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं,
रूपं हि मण्डलमृचोअ्थ तनुर्यजूंषि।
सामनि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं,
ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्।।
सुर्य का वह प्रशस्त रूप जिसका मण्डल ऋग्वेद, कलेवर यजुर्वेद तथा किरणें सामवेद है। जो सृष्टि आदि के कारण है, ब्रह्मा और शिव के स्वरूप है तथा जिनका रूप अचिंत्य और अलक्ष्य है, प्रातः काल मैं उनका स्मरण करता हूं।
त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण--
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी,
भानु:शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरूश्च शुक्र: शनिराहुकेतव:
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सुर्य, चन्द्रमा, मंगल,बुध, बृहस्पति, शुक्र,शनि,राहु और केतु ये सब मेरे प्रातः काल को मंगलमय करें ।

शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

Saturday, 4 November 2017

दैनिक सत्कर्म

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।
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‌                 * दैनिक सत्कर्म *
                     दुसरी पोस्ट -
आदरणीय मित्रों प्रातः काल माता, पिता, गुरु एवं ईश्वर का अभिवादन करना चाहिए। नित्य प्रातः काल निम्न श्लोकों का पाठ करने से बहुत कल्याण होता है। जैसे-
१. दिन अच्छा बीतता है।
२. दु: स्वप्न, कलिदोष, शत्रु,पाप और भव के भय का नाश होता है।
३.विष का भय नहीं होता।
४. धर्म की वृद्धि होती है,अज्ञानी को ज्ञान प्राप्त होता है।
५. रोग नहीं होता।
६. पुरी आयु मिलती है।
७. विजय प्राप्त होती है।
८. निर्धन धनी होता है।
९. भुख-प्यास और काम की बाधा नहीं होती है।
१०. सभी बाधाओं से छुटकारा मिलता है आदि ।

भगवत्प्रीत्यर्थ इन श्लोकों का पाठ करना चाहिए-
श्री गणेश स्मरण--
प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबंधु ,
सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्युग्मम् ।
उद्दडविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड-
माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम्।।
अनाथों के बंधु, सिंदूर से शोभायमान दोनों गण्डस्थलवाले, प्रबल विघ्न का नाश करने में समर्थ एवं इन्द्र आदि देवताओं से नमस्कृत श्री गणेश जी का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूं।
विष्णु स्मरण--
प्रातः स्मरामि भवभीतिमहार्तिनाशं,
नारायणं गरूडवाहनमब्जनाभम्।
ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं,
चक्रायुधं तरूणवारिजपत्रनेत्रम् ।।
संसार के भय रूपी महान दु:ख को नष्ट करने वाले, ग्राह से गजराज को मुक्त करने वाले, चक्रधारी एवं नवीन कमलदल के समान नेत्र वाले, पद्मनाभ गरूड़ वाहन भगवान श्री नारायण का मैं प्रातः स्मरण करता हूं।
शिव स्मरण--
प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं,
गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वांगशूलवरदाभय हस्तमीशं,
संसाररोगहरमौषधमद्वितियम्।।
संसार के भय को नष्ट करने वाले,देवेश,गंगाधर,वृषभ वाहन, पार्वती पति,हाथ में खट्वांग एवं त्रिशूल लिए और संसार रूपी रोग का नाश करने के लिए अद्वितीय औषध-स्वरूप,अभय एवं वर मुद्रा युक्त हाथ वाले भगवान शिव का मैं स्मरण करता हूं।

शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

Friday, 3 November 2017

* दैनिक सत्कर्म*


आदरणीय मित्रों जीवन में सत्कर्म का बहुत बडा महत्व है। सत्कर्म के बारे में हमारे धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से कहा गया है। जहां तक पढा और बडें बुजर्गों से सुना हुं वह अपने विवेक से कहता हुं।
कहते है कि जीवन में कुछ पाना है तो सुर्योदय से पहले बिस्तर का त्याग कर देना चाहिए । प्रातःकाल उठने के बाद स्नान से पहले जो आवश्यक विभिन्न कार्य है शास्त्रों ने उनके लिए सुनियोजित विघि विधान बताया है।
ब्रह्म मुहुर्त - सुर्योदय से चार घडी़ लगभग डेढ़ घंटे पुर्व में जग जाना चाहिए । इस समय सोना शास्त्रों में पुण्य का नाश करने वाला कहा गया है ।
करावलोकन - आंखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए पाठ करना चाहिए ।
  कराग्रे वसते लक्छ्मीः करमध्ये सरस्वती ।
  करमुले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते कर दर्शनम् ।।
अर्थात हाथ के आगे भाग मे लक्छ्मी , बीच मे सरस्वती और जड़ भाग में ब्रह्मा जी निवास करते है । अतः प्रातःकाल दोनों हाथों का दर्शन करना चाहिए।
भुमि-वंदना - बिस्तर से उठकर पृथ्वी पर पैर रखने के पहले पृथ्वी माता को प्रणाम करना चाहिए। पृथ्वी माता पर पैर रखने से पहले निम्न लिखित पाठ करना चाहिए।
   समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडिते ।
   विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श छमस्व मे ।
अर्थात समुद्र रुपी वस्त्रों को धारण करने वाली , पहाण रुपी स्तनों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी पृथ्वी देवि ! आप पैर स्पर्श करने के लिए क्षमा करें ।
शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

            

Saturday, 21 October 2017

कलि काल की महिमा

    

       काकभुशुण्डि  जी द्वारा कलि महिमा कहना

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य श्री रामचरित मानस की मूल भाषा अवधी है।उत्तर भारत में घर घर श्री रामचरित मानस को सम्मान,आदर से पूजा, पढ़ा और गाया जाता है। श्री रामचरित मानस में काकभुशुण्डि जी ने पक्षीराज गरुड़जी से कलियुग की महिमा वर्णन किया है :- 

                                              चौपाई 

                          बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।
                          द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥1॥
 भावार्थ:- कलियुग में न वर्ण धर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं।  ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता॥1॥ 
  
विवेचना  :-  प्रस्तुत चौपाई में काकभुशुण्डि जी के कहने का तात्पर्य यह है कि कलियुग में  वर्ण ,धर्म ,चारों आश्रम नहीं रहते है अर्थात लुप्त हो जाते है । कलियुग में शंकर वर्ण हो जायेगा जो आज के परिदृश्य में दिख भी रहा है। न धर्म का पालन होगा जैसे सत्य बोलना धर्म है परन्तु इस कलियुग में असत्य का ही बोल बाला दिखता है।  श्रुति ( जो क्रमशः सुना जाता रहा हो)को वेद कहते है. वेदों के विरोध में सब स्त्री और पुरुष लगे रहेगें। ब्राह्मण वेदों का क्रय - विक्रय करने वाले होंगे। आज कल दिख भी रहा है कि ब्राह्मण लोग वेद को भूलते जा रहे है।  जैसे अगर किसी से कहा जाय कि वेद की कोई एक कड़ी सुनाओ तो शायद ही कोई ब्राह्मण सुना पाए। राजा प्रजा को खा डालने वाले होते है अर्थात राजा प्रजा से नाना प्रकार के शोषण करती है जैसे कर ! नियम और अनुशाशन जो वेदो में कहेगे गए है ,उसकी आज्ञा कोई नहीं मानता। 
                          मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
                          मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥2॥ 
भावार्थ:-जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं॥2॥

विवेचना  :- जिसको जो रास्ता ( जो भाता हो) अच्छा लगता है वही उसके के लिए उत्तम है ,जो ज्यादा बोलते है ( गाल बजावा ) वही पंडित है ,जो झूठ बोलता हो,स्वांग रचता है, घमंड में चूर हो उसी को सभी संत कहते है।   

                     सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
                          जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥3॥ 
भावार्थ:-जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥3॥

 विवेचना  :- वही सयान ( बुद्धिमान ) है जो दुसरो के धन को चुरा ले चाहे कुछ भी करना पड़े चोरी ,बेईमानी आदि, जो घमंड करता हो वही सबसे बड़ा आचार-विचार वाला है , जो झूठी चिकनी - चुपड़ी बातें , हंसी - ठिठोली  करना जानता है वही इस कलियुग में गुणवान कहा जाता है। 
 
                    निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥
                        जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥4॥
भावार्थ:-जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान्‌ है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥4॥ 

विवेचना  :- इस कलियुग में वही ज्ञानी और वैरागी है जो सदाचारविहीन और वेदों को छोड़ दिया है जिसने बड़े -बड़े नाख़ून और बाल धारण किये हो , वही प्रसिद्द तपस्वी है। 

सादर नमन मित्रों अपने विचार अवश्य दें। 
धन्यवाद 

जय श्री राम 

पंडित राकेश शुक्ल शास्त्री
 

Monday, 1 May 2017

राजा हरिश्चंद्र

raja harishchandra 

 राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के इक्क्षवाकू वंश (सूर्य वंश) के प्रसिद्ध त्रेता युग के राजा थे. इनके पिता जी का नाम सत्यव्रत था. इनकी पत्नी का नाम तारा और पुत्र का रोहित था।इनके गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी थे। इनके राज्य में सब जगह सुख और शांति थी।सभी पौराणिक ग्रंथो में हरिश्चंद्र के सत्य व्रत की कथा का प्रभावकारी वर्णन मिलता है। कहा जाता कि सपने में भी वे जो बात कह देते थे उसका पालन निश्चित रुप से करते थे। उनके बारे में ये लोकोक्ति कही जाती है :-

चंद्र टरै सूरज टरै ,टरै जगत व्यव्हार। पै दृढ़व्रत श्री हरिश्चंद्र का , टरै  न सत्य विचार।।

कथाओं में वर्णन आता है हरिश्चंद्र बहुत धार्मिक और दानी प्रवृति के राजा थे। इनके यज्ञ और दान कर्म से पृथ्वी लोक और देव लोक में चर्चा का विषय बन गया।  कहते है एक बार देवराज इंद्र की सभा लगी और उस सभा में विशिष्ट जी और विश्वामित्र जी भी विरजमान थे।  जैसा की सर्वविदित है देवराज इंद्र हमेशा अपने सिंघासन से ससंकित रहने वाले देवता है।  कोई उनका सिंघासन न छीन ले इस भय से विश्वामित्र जी से राजा हरिश्चन्द्र के सत्य की परीक्षा लेने के लिए विश्वामित्र जी मना लिया और वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी से कहा हम आपकी परीक्षा के बीच में नहीं आएंगे अगर हमारा शिष्य पास हुआ तो अपनी तपस्या का फल उसे आपको देना पड़ेगा।

एक बार राजा हरिश्चंद्र की सभा में विश्वामित्र जी आये और उनसे उनके संपूर्ण राज्य को दान के रूप में मांग लिया और पांच सौ स्वर्ण मुद्रा दक्षिणा रूप में माँगा ,राजा ने कहा की " पांच सौ क्या आप चाहे जितनी स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिये। इस पर विश्वामित्र जी हॅसने लगे और राजा को याद दिलाये कि सारा राजपाठ के साथ राज्य को कोष भी वे दान कर चुके है और दान की हुई वस्तु को दुबारा दान नहीं दिया जाता। राजा हरिश्चंद्र ने पांच सौ स्वर्ण मुद्राए देने के लिए स्वीकार्य किया। राजा ने विश्वामित्र से समय माँगा , विश्वामित्र ने समय तो दे दिया किन्तु चेतावनी भी दी कि यदि समय पर दक्षिणा न मिली तो श्राप देकर भस्म कर देंगे , राजा को भस्म होने का भय तो नहीं था किन्तु समय से दक्षिणा न चुका पाने पर अपने अपयश का भय अवश्य था।  

राजा हरिश्चंद्र ने अपना राज्य विश्वामित्र को सौपकर वे अपना राज्य विश्वामित्र को सौंप कर अपनी पत्नी व पुत्र को लेकर काशी चले आये. काशी में राजा हरिश्चंद्र ने कई जगहों पर अपने को बेचने का प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली. रानी और पुत्र  को काशी के एक साहूकार ने खरीद लिया परन्तु पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं नहीं प्राप्त हुई तो अपने को भी बेचने का प्रयास किया। शाम तक राजा को श्मशान घाट के मालिक डोम  ने ख़रीदा। इस प्रकार राजा ने प्राप्त धन से विश्वामित्र की दक्षिणा चूका दी।

इस प्रकार सत्य के लिए राजा हरहरिश्चंद्र ने रानी तथा अपने पुत्र को बेंच कर अपना धर्म निभाया , जो राजा थे सत्य की रक्षा के लिए अब डोम के यहाँ श्मशान घाट कर वसूलने का कार्य करने लगे और उधर रानी और पुत्र रोहित साहूकार की सेवा में लग गए।  एक दिन सेठानी ने पूजा के लिए रोहित को पुष्प चयन के लिए भेजा और बगीचे में रोहित को सांप ने डस लिया और रोहित का देहांत हो गया। विधि का विधान देखिये रानी अपने पुत्र को लेकर श्मशान घाट पर ले गयी अंतिम संस्कार के लिए, जहा पर कर वसूलने का कार्य राजा हरिश्चंद्र कर रहे थे।राजा ने अपने धर्म के पालन के लिए बिना कर दिए अंतिम संस्कार करने से मना कर दिए।  रानी और राजा ने एक दूसरे को पहचान लिया अपने पुत्र को भी पहचान लिया पर अपने धर्म पर अटल रहे , रानी ने कर के रूप में अपना आँचल फाड़कर जैसे देना चाहा उसी समय स्वयं ईश्वर प्रकट हो गए और उन्होंने राजा से कहा -" हरिश्चंद्र ! तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है।  तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है , तुम इतिहास में अमर रहोगें। "

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हरिश्चंद्र ने ईश्वर से कहा -"अगर वाकई मेरी कर्तव्यनिष्ठा और सत्य के प्रति समर्पण सही है तो कृपया इस स्त्री के पुत्र को जीवनदान दीजिए"। इतने में ही रोहिताश्व जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने भी हरिश्चंद्र का राजपाठ उन्हें वापस लौटा दिया।

सत्यमेव जयते 
पंडित राकेश शुक्ल  शास्त्री

Thursday, 27 April 2017

BHAGAVAN PARASHURAM

                                                          भगवान परशुराम 



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 परिचय 
भगवान परशुराम जी अहंकारी और दुष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्द है।  वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार - प्रसार करना चाहते थे . कहा जाता है भारत के अधिकतर गांव उन्ही के द्वारा बसाये गए।  वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकरी संतानों में से एक थे , जो हमेशा गुरु और माता - पिता की आज्ञा का पालन करते थे।  परशुराम जी का रामायण , महाभारत ,भागवत पुराण और कल्कि पुराण आदी अनेक ग्रंथो में उल्लेख किया गया है।   वे ब्राह्मण कुल के थे पर उनका कर्म क्षत्रिओं के थे।  बाल्यकाल में ही वे अपनी माता से अधिकांश विद्यायें सिख ली थी वे पशु पक्छियों की भाषा को समझते थे और उनसे बातें करते थे। खूंखार पशु भी उनके स्पर्श से उनके मित्र बन जाते थे। 
जन्म

परशुराम भगवान विष्णु के छठे आवेशावतार है , ये चिरंजीवी होने से कल्पांत तक स्थायी है।  इनका प्रादुर्भाव वैशाख  मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था , इसलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया कही जाती है।इनके पिता का नाम यमदग्नि और माता का रेणुका था।  पांच भाइयों में सबसे छोटे थे , रुक्मवान , सुखेन , वसु , विश्वानस और परशुराम लेकिन गुणों में सबसे आगे थे।      
 माता का वध 
 एक दिन गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता हुआ देख हवन के लिए गंगा तट  पर जल लेने गयी रेणुका आसक्त हो गई और कुछ देर तक वही रुक गयी।  हवन का समय बीत जाने पर मुनि यमदग्नि बहुत क्रोधित हुए आर्य मर्यादा के विरोध आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के लिए दंड स्वरुप सभी पुत्रो को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी , लेकिन मोहवश किसी पुत्र ने ऐसा नहीं किया।  तब मुनि ने उन्हें श्राप दे दिया और उनकी विचार शक्ति का नाश हो गयी ।  अन्य भाइयों द्वारा ऐसा न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित  परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिर धड़ से अलग कर दिया।  यह देखकर महर्षि यमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और वरदान मांगने के लिया कहा तो उन्होंने तीन वर मांगे -१. माँ पुनः जीवित हो जाए २. उन्हें मरण की स्मृति न रहे ३.भाई चेतना  युक्त हो जाये।  महर्षि यमदग्नि ने उन्हें तीनो वरदान दे दिए। माता पुनः जीवित हो गयी।

 पिता की हत्या और परशुराम का प्रतिशोध 
कथा है कि हैहय वंश के अधिपति कार्त्यवीर्य अर्जुन ( सहस्त्रार्जुन) ने कठिन तप के द्वारा भगवान दत्तात्रेय को खुश कर एक हजार भुजाये और युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश जंगल में शिकार करते वह यमदग्नि जी के आश्रम पर जा पंहुचा।  देवराज इंद्रा के द्वारा दी हुई कपिला कामधेनु ( गाय ) की सहायता से हुए सभी सैनिको का आथित्य सत्कार पर लोभ के कारण यमदग्नि की अनादर करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर मुनि की हत्या करके चला गया। इस पर क्रोधित होकर परशुराम ने अपने फरसे के प्रहार से उसकी सारी भुजाए काट डाली व शिर को धड़ से अलग कर दिया और रेणुका माता पति की चिता की अग्नि में प्रवेश कर सती हो गयी।  इस कांड से क्रोधित परशुराम ने पूरी ताकत से महिष्मति नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया।  इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पुरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विकाश किया।  यही नहीं अपने पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रो के रक्त से किया।  अंत में महर्षि रीचिक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका। इसके बाद उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सातों द्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी और महेंद्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे। 

उपसंहार 
रामायण और महाभारत काल में भी भगवान परशुराम का उल्लेख मिलता है। उन्होंने सैन्य शिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी है. लेकिन कुछ अपवाद भी है जैसे भीष्म और कर्ण।  कर्ण की कथा आतीं है जिसमे कर्ण भगवान परशुराम की सेवा कर रहा था और उसकी जंघा में  एक बिच्छू ने घाव कर दिया परन्तु विश्राम भंग नहीं किया।  अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर एक ब्राह्मण पुत्र में इतनी सहनशक्ति नहीं हो सकती कि वह बिच्छु का दंश सहन कर सके।  कर्ण के झूठ बोलने पर उन्होंने श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी तो वह उसे काम नहीं आएगी। कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के दसवे अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें शिक्षा देगें वे ही कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके उनके दिव्यास्त्र को प्राप्त करने के लिए कहेगे। 

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।

विश्ववन्द्य महाबाहु भगवान परशुराम के बारे अनगिनत कथानक उपलब्ध है वे आज भी हमारे आप के बीच विद्यमान है हमें उनके आदर्शो पर चलना चाहिए , भगवान परशुराम जी जीवन से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए और सदैव अन्याय , अत्याचार का पूरा विरोध करना चाहिए।

उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना ना कि अपनी प्रजा से आज्ञा का पालन करवानां। 

अंत में सभी सनातनियो , श्रेष्ठों , तथा मित्रो को भगवान परशुराम की जयंती की  बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाये !!!

 जय भगवान परशुराम जी की 

पंडित राकेश शुक्ल शास्त्री



































Sunday, 23 April 2017

विधि निषेध

                                                       विधि और निषेध 

हम कानून से घिरी दुनिया में रहते  हैं. भारतीय राज्य आपकी जन्मजात नागरिकता का सम्मान करते हुए तदनुरूप आपके जीवन के अधिकार के साथ दूसरों के साथ आपकी स्वतंत्रता, समानता और गरिमा का आदर करता है. अप्रैल 2010  के बाद से राज्य ने प्रत्येक 6  से 14 साल के हरेक बाल नागरिक के लिए आठ वर्ष की बुनियादी शिक्षा का भरोसा दिया है.भारतीय संविधान के अनुसार विधि और निषेध का पालन करना हर भारतीय का मूल कर्त्तव्य है.

विधि :- साधारण रूप से विधि को व्यवस्था आदि का तरीका या प्रणाली ,शास्त्र सम्मत व्यवस्था या दिशा निर्देश को कह सकते है। जैसे - जीवन, स्वतंत्रता, समानता, गरिमा, शिक्षा आदि आपके अधिकार संवैधानिक कानून के दायरे में आते है।

निषेध :- मना करने की क्रिया या भाव ऐसा नियम या आज्ञा जिसमे किसी बात की मनाही हो। जैसे- चोरी न करना , बल मजदूरी न करना आदि। 

धन्यवाद,
जय श्री राम
राकेश शुक्ल शास्त्री


तुलसीदास

  “पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी धरयो शरीर||" तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा...