रक्षाबंधन उत्सव

भारत माता की जय

Wednesday, 8 November 2017

जय श्री हरि

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।
                 छठी पोस्ट -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू फल की दृष्टि से कर्म मत कर और न ही ऐसा सोच की फल की आशा के बिना कर्म क्यों करूं |

भगवान विष्णु जी और नारद मुनि जी की यह बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक कथा है।

एक बार नारद मुनि जी ने भगवान विष्णु जी से पुछा, हे भगवन आप का इस समय सब से प्रिया भगत कोन है?, अब विष्णु तो भगवान है, सो झट से समझ गये अपने भगत नराद मुनि की बात, ओर मुस्कुरा कर वोले ! मेरा सब से प्रिया भगत उस गांव का एक मामुली किसान है, यह सुन कर नारद मुनि जी थोडा निराश हुये, ओर फ़िर से एक प्रशन किया, हे भगवान आप का बडा भगत तो मै हुं, तो फ़िर सब से प्रिया क्यो नही?

भगवान विष्णु जी ने नारद मुनि जी से कहा, इस का जबाब तो तुम खुद ही दो गे, जाओ एक दिन उस के घर रहो ओर फ़िर सारी बात मुझे बताना,नारद मुनि जी सुबह सवेरे मुंह अंधेर उस किसान के घर पहुच गये, देखा अभी अभी किसान जागा है, ओर उस ने अब से पहले अपने जानवरो को चारा बगेरा दिया, फ़िर मुंह हाथ थोऎ, देनिक कार्यो से निवर्त हुया, जल्दी जल्दी भगवान का नाम लिया, रुखी सूखी रोटी खा कर जल्दी जल्दी अपने खेतो पर चला गया, सारा दिन खेतो मे काम किया|

और शाम को वापिस घर आया जानवरो को अपनी अपनी जगह बांधा, उन्हे चारा पानी डाला, हाथ पांओ धोये, कुल्ला किया, फ़िर थोडी देर भगवान का नाम लिया, फ़िर परिवर के संग बेठ कर खाना खाया, ओर कुछ बाते की ओर फ़िर सो गया|

अब सारा दिन यह सब देख कर नारद मुनि जी, भगवान विष्णु के पास वापिस आये, ओर बोले भगवन मै आज सारा दिन उस किसान के संग रहा, लेकिन वो तो ढंग से आप का नाम भी नही ले सकता, उस ने थोडी देर सुबह थोडी देर शाम को ओर वो भी जल्दी जल्दी आप का ध्यान किया, ओर मे तो चोबीस घंटे सिर्फ़ आप का ही नाम जपता हुं, क्या अब भी आप का सब से प्रिय भगत वो गरीब किसान ही है, भगवान विष्णु जी ने नारद की बात सुन कर कहा, अब इस का जबाब भी तुम मुझे खुद ही देना|

और भगवान विष्णु जी ने एक कलश अमृत से भरा नारद मुनि को थमाया, ओर बोले इस कलश को ले कर तुम तीनो लोको की परिकिरमा कर के आओ, लेकिन ध्यान रहे अगर एक बुंद भी अमृत नीचे गिरा तो तुम्हारी सारी भगती ओर पुन्य नष्ट हो जाये गे, नारद मुनि तीनो लोको की परिक्र्मा कर के जब भगवान विष्णु के पास वापिस आये तो , खुश हो कर बोले भगवान मेने एक बुंद भी अमृत नीचे नही गिरने दिया, विष्णु भगवान ने पुछा ओर इस दोराना तुम ने मेरा नाम कितनी बार लिया?मेरा स्मरण कितनी बार किया ? तो नारद बोले अरे भगवान जी मेरा तो सारा ध्यान इस अमृत पर था, फ़िर आप का ध्यान केसे करता|

भगवान विष्णु ने कहा, हे नारद देखो उस किसान को वो अपना कर्म करते हुये भी नियमत रुप से मेरा स्मरण करता है, क्यो कि जो अपना कर्म करते हुये भी मेरा जाप करे वो ही मेरा सब से प्रिया भगत हुआ, तुम तो सार दिन खाली बेठे ही जप करते हो, ओर जब तुम्हे कर्म दिया तो मेरे लिये तुम्हारे पास समय ही नही था, तो नारद मुनि सब समझ गये ओर भगवान के चरण पकड कर बोले हे भगवन आप ने मेरा अंहकार तोड दिया, आप धन्य है|

जय श्रीमन्नारायण
क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

Tuesday, 7 November 2017

यज्ञोपवीत

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।
                 पांचवी पोस्ट -
                * यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) *
भए कुमार जबहिं सब भ्राता।
दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई।
अलप काल बिद्या सब आई॥

ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्री रघुनाथजी (भाइयों सहित) गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उनको सब विद्याएँ आ गईं॥

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज: ।।

जैसे पत्थर ही भगवान नहीं होता,प्रत्यूत मंत्रों से भगवान को उसमें प्रतिष्ठित किया जाता है, वैसे ही यज्ञोपवीत धागा मात्र नहीं होता। प्रत्यूत निर्माण के समय से ही यज्ञोपवीत में संस्कारों का आधान होने लगता है।बन जाने पर इसकी ग्रंथियों में और नवों तंतुओं में ओंकार, अग्नि आदि भिन्न भिन्न देवताओं के आवाहन आदि कर्म होते हैं।

यज्ञोपवीत- धारण करने की आवश्यकता:-
उपनयन के समय पिता तथा आचार्य द्वारा त्रैवर्णिक वटुओं को जो यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है, ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ तीनों आश्रमों में उसे अनिवार्य अखण्ड रूप में धारण किए रहने का शास्त्रों का आदेश है । किंतु धारण किया हुआ यज्ञोपवीत अवस्था विशेष में बदलकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करना पड़ता है।

यज्ञोपवीत कब बदले ?:-
यदि यज्ञोपवीत कंधे से सरककर बायें हाथ के नीचे आ जाय , गिर जाय, कोई धागा टुट जाय, शौच आदि के समय कानपर डालना भुल जाय और अस्पृश्य से स्पर्श हो जाय तो नया यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए। गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम वाले को दो यज्ञोपवीत पहनना चाहिए।
ब्रह्मचारी एक जनेऊ पहन सकते हैं। चार महीने बीतने पर नया यज्ञोपवीत पहन लें। इसी तरह उपाकर्म में,जननाशौच और मरणाशौच में, श्राद्ध में,यज्ञ आदि में, चंद्र ग्रहण और सुर्य ग्रहण के उपरांत भी नये यज्ञोपवीतों का धारण करना अपेक्षित है। यज्ञोपवीत कमरतक रहें।लोग सुविधा के लिए एक वर्ष के लिए श्रावणी में यज्ञोपवीत को अभिमंत्रित कर रख लेते हैं और आवश्यकता पड़ने पर धारण विधि से पहन लेते हैं।

जीर्ण यज्ञोपवीत का त्याग:-
पुराने जनेऊ को कण्ठी जैसा बनाकर सिरपर से पीठ की ओर निकाल कर उसे जल में प्रवाहित कर दें। इसके बाद यथाशक्ति गायत्री मंत्र का जप करें, फिर हाथ जोड़कर भगवान का स्मरण करें।
ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।

शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

Monday, 6 November 2017

जय श्री राम

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।
‌              * दैनिक सत्कर्म *
                  चौथी पोस्ट -
आदरणीय मित्रों प्रातः काल निम्न श्लोकों का पाठ करने से बहुत कल्याण होता है:-
ऋषि स्मरण--
भृगुर्वसिष्ठ: क्रतुरंगिराश्च,
मनु: पुलस्त्य: पुलहश्च गौतम:।
रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्ष:,
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्।।(वामन पुराण)
भृगु, वसिष्ठ,क्रतु,अंगीरा, मनु, पुलस्त्य,पुलह, गौतम,रैम्भ, मरीचि, च्यवन और दक्ष ये समस्त मुनिगण मेरे प्रातः काल को मंगलमय करें।
प्रकृति स्मरण--
पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथाप:,
स्पर्शी च वायुज्वर्लितं च तेज:।
नभ: सशब्दं महता सहैव,
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्।।(वामन पुराण)
गन्ध युक्त पृथ्वी,रसयुक्त जल, स्पर्श युक्त वायु, प्रज्वलित तेज, शब्द सहित आकाश एवं महत्तत्व ये सभी मेरे प्रातः काल को मंगलमय करें।
पुण्य श्लोकों का स्मरण--
पुण्य श्लोको नलो राजा , पुण्य श्लोको जनार्दन:।
पुण्य श्लोको च वैदेही , पुण्य श्लोको युधिष्ठिर:।।१।।
अश्वत्थामा बलिव्यासो ,हनुमांनश्च विभिषण:।
कृप:  परशुरामश्च , सप्तैते  चिरजीविन:।।२।।(पद्मपुराण)
वाराणस्यां भैरवो देव:, संसारभयनाशनं।
अनेकजन्मकृतं पापों , स्मरणेन विनश्यति ।।३।।
उमा उषा च वैदेही, रमा गंगेति पंचकम्।
प्रातरेव पठेन्नित्यं, सौभाग्यं वर्धते सदा ।।४।।
रामलक्ष्मणौ सीता च, सुग्रीवो हनुमान् कपि:।
पंचैतान् स्मरतो नित्यं, महाबाधा प्रमुच्यते।। ५।। (पद्मपुराण)
शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

Sunday, 5 November 2017

* दैनिक सत्कर्म*

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।
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‌                 * दैनिक सत्कर्म *
                     तीसरी पोस्ट -
आदरणीय मित्रों प्रातः काल निम्न श्लोकों का पाठ करने से बहुत कल्याण होता है।
देवी स्मरण--
प्रातः स्मरामि शरदिन्दुकरोज्जवलाभां,
सद्रत्नवन्मकरकुण्डलहारभूषाम्।
दिव्यायुधोर्जितसुनीलसहस्त्रहस्तां,
रक्तोत्पलाभचरणां भवतीं परेशाम्।।
शरत्कालीन चन्द्रमा के समान उज्जवल आभावाली, उत्तम रत्नों से जटित मकरकुण्डलों तथा हाथों से सुशोभित,दिव्य आयुधों से दीप्त सुंदर नीले हजारों हाथों वाली, लाल कमल की आभा युक्त चरणों वाली भगवती दुर्गा देवी का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूं।
सुर्य स्मरण--
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं,
रूपं हि मण्डलमृचोअ्थ तनुर्यजूंषि।
सामनि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं,
ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्।।
सुर्य का वह प्रशस्त रूप जिसका मण्डल ऋग्वेद, कलेवर यजुर्वेद तथा किरणें सामवेद है। जो सृष्टि आदि के कारण है, ब्रह्मा और शिव के स्वरूप है तथा जिनका रूप अचिंत्य और अलक्ष्य है, प्रातः काल मैं उनका स्मरण करता हूं।
त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण--
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी,
भानु:शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरूश्च शुक्र: शनिराहुकेतव:
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सुर्य, चन्द्रमा, मंगल,बुध, बृहस्पति, शुक्र,शनि,राहु और केतु ये सब मेरे प्रातः काल को मंगलमय करें ।

शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

Saturday, 4 November 2017

दैनिक सत्कर्म

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री परमात्मने नमः ।।
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‌                 * दैनिक सत्कर्म *
                     दुसरी पोस्ट -
आदरणीय मित्रों प्रातः काल माता, पिता, गुरु एवं ईश्वर का अभिवादन करना चाहिए। नित्य प्रातः काल निम्न श्लोकों का पाठ करने से बहुत कल्याण होता है। जैसे-
१. दिन अच्छा बीतता है।
२. दु: स्वप्न, कलिदोष, शत्रु,पाप और भव के भय का नाश होता है।
३.विष का भय नहीं होता।
४. धर्म की वृद्धि होती है,अज्ञानी को ज्ञान प्राप्त होता है।
५. रोग नहीं होता।
६. पुरी आयु मिलती है।
७. विजय प्राप्त होती है।
८. निर्धन धनी होता है।
९. भुख-प्यास और काम की बाधा नहीं होती है।
१०. सभी बाधाओं से छुटकारा मिलता है आदि ।

भगवत्प्रीत्यर्थ इन श्लोकों का पाठ करना चाहिए-
श्री गणेश स्मरण--
प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबंधु ,
सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्युग्मम् ।
उद्दडविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड-
माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम्।।
अनाथों के बंधु, सिंदूर से शोभायमान दोनों गण्डस्थलवाले, प्रबल विघ्न का नाश करने में समर्थ एवं इन्द्र आदि देवताओं से नमस्कृत श्री गणेश जी का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूं।
विष्णु स्मरण--
प्रातः स्मरामि भवभीतिमहार्तिनाशं,
नारायणं गरूडवाहनमब्जनाभम्।
ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं,
चक्रायुधं तरूणवारिजपत्रनेत्रम् ।।
संसार के भय रूपी महान दु:ख को नष्ट करने वाले, ग्राह से गजराज को मुक्त करने वाले, चक्रधारी एवं नवीन कमलदल के समान नेत्र वाले, पद्मनाभ गरूड़ वाहन भगवान श्री नारायण का मैं प्रातः स्मरण करता हूं।
शिव स्मरण--
प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं,
गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वांगशूलवरदाभय हस्तमीशं,
संसाररोगहरमौषधमद्वितियम्।।
संसार के भय को नष्ट करने वाले,देवेश,गंगाधर,वृषभ वाहन, पार्वती पति,हाथ में खट्वांग एवं त्रिशूल लिए और संसार रूपी रोग का नाश करने के लिए अद्वितीय औषध-स्वरूप,अभय एवं वर मुद्रा युक्त हाथ वाले भगवान शिव का मैं स्मरण करता हूं।

शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

Friday, 3 November 2017

* दैनिक सत्कर्म*


आदरणीय मित्रों जीवन में सत्कर्म का बहुत बडा महत्व है। सत्कर्म के बारे में हमारे धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से कहा गया है। जहां तक पढा और बडें बुजर्गों से सुना हुं वह अपने विवेक से कहता हुं।
कहते है कि जीवन में कुछ पाना है तो सुर्योदय से पहले बिस्तर का त्याग कर देना चाहिए । प्रातःकाल उठने के बाद स्नान से पहले जो आवश्यक विभिन्न कार्य है शास्त्रों ने उनके लिए सुनियोजित विघि विधान बताया है।
ब्रह्म मुहुर्त - सुर्योदय से चार घडी़ लगभग डेढ़ घंटे पुर्व में जग जाना चाहिए । इस समय सोना शास्त्रों में पुण्य का नाश करने वाला कहा गया है ।
करावलोकन - आंखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए पाठ करना चाहिए ।
  कराग्रे वसते लक्छ्मीः करमध्ये सरस्वती ।
  करमुले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते कर दर्शनम् ।।
अर्थात हाथ के आगे भाग मे लक्छ्मी , बीच मे सरस्वती और जड़ भाग में ब्रह्मा जी निवास करते है । अतः प्रातःकाल दोनों हाथों का दर्शन करना चाहिए।
भुमि-वंदना - बिस्तर से उठकर पृथ्वी पर पैर रखने के पहले पृथ्वी माता को प्रणाम करना चाहिए। पृथ्वी माता पर पैर रखने से पहले निम्न लिखित पाठ करना चाहिए।
   समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडिते ।
   विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श छमस्व मे ।
अर्थात समुद्र रुपी वस्त्रों को धारण करने वाली , पहाण रुपी स्तनों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी पृथ्वी देवि ! आप पैर स्पर्श करने के लिए क्षमा करें ।
शेष क्रमशः :-
।। जयतु सनातन धर्मः ।।

            

Saturday, 21 October 2017

कलि काल की महिमा

    

       काकभुशुण्डि  जी द्वारा कलि महिमा कहना

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य श्री रामचरित मानस की मूल भाषा अवधी है।उत्तर भारत में घर घर श्री रामचरित मानस को सम्मान,आदर से पूजा, पढ़ा और गाया जाता है। श्री रामचरित मानस में काकभुशुण्डि जी ने पक्षीराज गरुड़जी से कलियुग की महिमा वर्णन किया है :- 

                                              चौपाई 

                          बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।
                          द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥1॥
 भावार्थ:- कलियुग में न वर्ण धर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं।  ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता॥1॥ 
  
विवेचना  :-  प्रस्तुत चौपाई में काकभुशुण्डि जी के कहने का तात्पर्य यह है कि कलियुग में  वर्ण ,धर्म ,चारों आश्रम नहीं रहते है अर्थात लुप्त हो जाते है । कलियुग में शंकर वर्ण हो जायेगा जो आज के परिदृश्य में दिख भी रहा है। न धर्म का पालन होगा जैसे सत्य बोलना धर्म है परन्तु इस कलियुग में असत्य का ही बोल बाला दिखता है।  श्रुति ( जो क्रमशः सुना जाता रहा हो)को वेद कहते है. वेदों के विरोध में सब स्त्री और पुरुष लगे रहेगें। ब्राह्मण वेदों का क्रय - विक्रय करने वाले होंगे। आज कल दिख भी रहा है कि ब्राह्मण लोग वेद को भूलते जा रहे है।  जैसे अगर किसी से कहा जाय कि वेद की कोई एक कड़ी सुनाओ तो शायद ही कोई ब्राह्मण सुना पाए। राजा प्रजा को खा डालने वाले होते है अर्थात राजा प्रजा से नाना प्रकार के शोषण करती है जैसे कर ! नियम और अनुशाशन जो वेदो में कहेगे गए है ,उसकी आज्ञा कोई नहीं मानता। 
                          मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
                          मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥2॥ 
भावार्थ:-जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं॥2॥

विवेचना  :- जिसको जो रास्ता ( जो भाता हो) अच्छा लगता है वही उसके के लिए उत्तम है ,जो ज्यादा बोलते है ( गाल बजावा ) वही पंडित है ,जो झूठ बोलता हो,स्वांग रचता है, घमंड में चूर हो उसी को सभी संत कहते है।   

                     सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
                          जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥3॥ 
भावार्थ:-जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥3॥

 विवेचना  :- वही सयान ( बुद्धिमान ) है जो दुसरो के धन को चुरा ले चाहे कुछ भी करना पड़े चोरी ,बेईमानी आदि, जो घमंड करता हो वही सबसे बड़ा आचार-विचार वाला है , जो झूठी चिकनी - चुपड़ी बातें , हंसी - ठिठोली  करना जानता है वही इस कलियुग में गुणवान कहा जाता है। 
 
                    निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥
                        जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥4॥
भावार्थ:-जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान्‌ है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥4॥ 

विवेचना  :- इस कलियुग में वही ज्ञानी और वैरागी है जो सदाचारविहीन और वेदों को छोड़ दिया है जिसने बड़े -बड़े नाख़ून और बाल धारण किये हो , वही प्रसिद्द तपस्वी है। 

सादर नमन मित्रों अपने विचार अवश्य दें। 
धन्यवाद 

जय श्री राम 

पंडित राकेश शुक्ल शास्त्री
 

तुलसीदास

  “पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी धरयो शरीर||" तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा...